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Kabir Ke Dohe: कबीर के 5 चुनिंदा दोहे जो बताते हैं साथ-संगत का मर्म, कैसे हों दोस्त

साहित्य
कोयला भी हो उजला, जरि बरि हो जो सेत ।
मूरख होय न अजला, ज्यों कालम
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                            कोयला भी हो उजला, जरि बरि हो जो सेत ।
                                                                 
                            
मूरख होय न अजला, ज्यों कालम का खेत ।।

भावार्थ:-
कोयला भी उजला हो जाता है जब अच्छी तरह से जलकर उसमें सफेदी आ जाती है। लेकिन मूर्ख का सुधरना उसी प्रकार नहीं होता जैसे ऊसर खेत में बीज नहीं उगते।
 

ऊँचे कुल की जनमिया, करनी ऊँच न होय ।
कनक कलश मद सों भरा, साधु निन्दा कोय ।।

भावार्थ:-
जैसे किसी का आचरण ऊँचे कुल में जन्म लेने से,ऊँचा नहीं हो जाता। उसी तरह सोने का घड़ा यदि मदिरा से भरा है, तो वह महापुरुषों द्वारा निन्दित ही है।
 
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एक वर्ष पहले

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