शकील बदायूंनी यानी हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा और विरले शायरों में से एक जो गीत के साथ शायरी भी लिखते थे। फ़िल्मी महफ़िलों के साथ-साथ अदबी मुशायरों में शामिल रहते थे। लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि सरे आम एक बुज़ुर्ग शायर ने उन्हें डांट दिया, अपनी तारीफ़ पर भी ख़ुश न हुए और बोले कि “तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।”
आगरा के बाद उत्तर-प्रदेश में अगर कोई पीर-पेड़े और शायरों का शहर हुआ तो वो है बदायूं। फिर शायरों ने भले शहर छोड़ दिया लेकिन अपने इस महबूब शहर के नाम को अपने नाम के साथ हमेशा के लिए चस्पा कर लिया। शकील बदायूंनी ने ये भी यही किया। बंबई रहे लेकिन बदायूंनी बनकर। पहले-पहल तो शकील बदायूंनी शायरी ही करते थे, अपने एक रिश्तेदार से मुतासिर होकर उन्होंने शेर कहने शुरु कर दिए थे। कई सम्मान और पहचान बतौर शायर उन्होंने पा ली थी। वे अब दिल्ली जाकर भी मुशायरे करने लगे थे।
फिर वे मुंबई भी गए। क़िस्मत ने काम किया। जल्द ही नौशाद मिल गए थे और फ़िल्मों में गानों की शृंखला शुरु हो गई। लगातार उन्होंने फ़िल्मफ़ेयर सम्मान जीता। लेकिन कलाकार अपना मूल भी कहां भूलता है। वह मुशायरों में भी मुसलसल शामिल रहते थे। एक बार की बात है कि इसी तरह के एक मुशायरे में एक बुज़ुर्ग शायर ने उन्हें डांट दिया था। वो भी किसी शेर को लेकर नहीं बल्कि एक फ़िल्म में लिखे उनके प्रसिद्ध गाने को लेकर।
ये क़िस्सा वाणी प्रकाशन की किताब `चेहरे` में दर्ज है। इस किताब में मशहूर शायर एक क़िस्से को याद करते हुए लिखते हैं कि -
''मैंने पहली बार उन्हें ग्वालियर में मेले के मुशायरे में देखा और सुना था। गर्म सूट और टाई, खूबसूरती से संवरे हुए बाल और चेहरे की आभा से वे शाइर से अधिक फिल्मी कलाकार नज़र आते थे। मुशायरा शुरू होने से पहले वे पंडाल में अपने प्रशंसकों को आटोग्राफ से नवाज़ रहे थे। उनके होठों की मुस्कुराहट कलम की लिखावट का साथ दे रही थी। शकील को अपने महत्व का पता था। वे यह भी जानते थे कि उनकी हर हरकत और इशारे पर लोगों की निगाहें हैं।''
इस मुशायरे में हजरत दाग़ के अंतिम दिनों के प्रतिष्ठित मुकामी शाइरों में हजरत नातिक गुलावटी, को भी नागपुर से बुलाया गया था। लंबे पूरे पठानी जिस्म और दाढ़ी रोशन चेहरे के साथ वो जैसे ही पंडाल के अंदर घुसे, सारे लोग सम्मान में खड़े हो गए।
शकील इन बुजुर्ग के स्वभाव से शायद परिचित थे, वे उन्हें देखकर नातिक साहब का ही एक लोकप्रिय मत्ला पढ़ते हुए उनसे हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ेः
वो आंख तो दिल को लेने तक बस दिल की साथी होती है
फिर लेकर रखना क्या जाने, दिल लेती है और खोती है
लेकिन मौलाना नातिक इस प्रशंसा स्तुति से खुश नहीं हुए। उनके माथे पर उन्हें देखते ही बल पड़ने लगे। वे अपने हाथ की छड़ी को उठा-उठा कर किसी स्कूली उस्ताद की तरह भारी आवाज में बोल रहे थे - "बर्खुरदार मियां शकील, तुम्हारे तो पिता भी शाइर थे और चाचा मौलाना जिया उल कादरी भी उस्ताद शाइर थे। तुमसे तो छोटी छोटी गलतियों की उम्मीद हमें न थी। पहले भी तुम्हें सुना-पढ़ा था मगर कुछ दिन पहले ऐसा महसूस हुआ कि तुम भी उन्हीं तरक्की पसंदों में शामिल हो गए हो जो रवायत और तहजीब के दुश्मन हैं।"
शकील इस अचानक आक्रमण के लिए तैयार नहीं थे। वे घबरा गए लेकिन बुजुर्गों का सम्मान उनके स्वभाव का हिस्सा था। वे सबके सामने अपनी आलोचना को मुस्कुराहट से छुपाते हुए उनसे पूछने लगे "हज़रत आपकी शिकायत वाज़िब है लेकिन मेहरबानी करके गलती की निशानदेही भी कर दें तो मुझे उसमें सुधारने में सुविधा होगी। आप फरमाएं मुझसे कहां भूल हुई है?"
''बर्खुरदार आजकल तुम्हारा एक फिल्मी गीत रेडियो पर अक्सर सुनाई दे जाता है, उसे कभी कभार मजबूरी में हमें भी सुनना पड़ता है, उसका पहला शेर यों हैः
चौहदवीं का चांद हो या आफताब हो
जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो ..........
मियां इन दोनों मिसरों का वजन अलग अलग है। पहले मिसरे में तुम लगा देने यह दोष दूर किया जा सकता था। कोई और ऐसी गलती करता तो हम नहीं टोकते, मगर तुम तो हमारे दोस्त के लड़के हो, हमें अज़ीज़ भी हो, इसलिए सूचित कर रहे हैं। बदायूं छोड़कर मुंबई में भले ही बस जाओ मगर बदायूं की विरासत का तो निर्वाह करो।''
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