आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अहमद मासूम: दिलों पे ज़ख़्म लगा के हज़ार गुज़री बहार

ahmad masoom famous ghazal dilon pe zakhm laga ke hazar guzri bahaar
                
                                                         
                            


दिलों पे ज़ख़्म लगा के हज़ार गुज़री बहार
गई है छोड़ के इक यादगार गुज़री बहार

मिरे क़रीब जो कोई गुल-ए-बदन महका
तो आई याद कोई ख़ुश-गवार गुज़री बहार

किसी तरह मुझे पागल न कर सकी वर्ना
तिरे बग़ैर भी आई बहार गुज़री बहार

हर एक सर्व-ए-रवाँ पर गुमाँ कि जैसे वही
हो मेरा माज़ी मिरी यादगार गुज़री बहार

मिरे नसीब का नौहा ख़िज़ाँ ये अहद-ए-ख़िज़ाँ
तिरे करम का फ़साना बहार गुज़री बहार

13 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर