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फ़ारिग़ बुख़ारी: ज़िंदगी ख़्वाबों से बहलाते नहीं

farigh bukhari famous ghazal zindagi khwabon se bahlate nahin
                
                                                         
                            


ज़िंदगी ख़्वाबों से बहलाते नहीं
अपने धोके में भी हम आते नहीं

ऐसे भी कुछ रास्ते हैं शहर में
जो कहीं आते नहीं जाते नहीं

कितनी ऐसी ज़िंदा लाशें हैं जिन्हें
एहतिरामन लोग दफ़नाते नहीं

ज़िंदगानी के किसी मंज़र से हम
बे-नियाज़ाना गुज़र जाते नहीं

लुटते हैं माल-ए-ग़नीमत की तरह
हम किसी साइल को तरसाते नहीं

रुत हो तूफ़ानों की या फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ
ग़ुंचा-ओ-गुल संग बन जाते नहीं

किस क़दर ज़िंदा हक़ाएक़ हैं मगर
कम-सवादों को नज़र आते नहीं

एक दिन पहले

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