ज़िंदगी ख़्वाबों से बहलाते नहीं
अपने धोके में भी हम आते नहीं
ऐसे भी कुछ रास्ते हैं शहर में
जो कहीं आते नहीं जाते नहीं
कितनी ऐसी ज़िंदा लाशें हैं जिन्हें
एहतिरामन लोग दफ़नाते नहीं
ज़िंदगानी के किसी मंज़र से हम
बे-नियाज़ाना गुज़र जाते नहीं
लुटते हैं माल-ए-ग़नीमत की तरह
हम किसी साइल को तरसाते नहीं
रुत हो तूफ़ानों की या फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ
ग़ुंचा-ओ-गुल संग बन जाते नहीं
किस क़दर ज़िंदा हक़ाएक़ हैं मगर
कम-सवादों को नज़र आते नहीं
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