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नोशी गिलानी: जलाए रक्खूँगी सुब्ह तक मैं तुम्हारे रस्तों में अपनी आँखें

joshi gilani famous ghazal mohabbatein jab shumar karna toh sajishein bhi shumar karna
                
                                                         
                            


मोहब्बतें जब शुमार करना तो साज़िशें भी शुमार करना
जो मेरे हिस्से में आई हैं वो अज़िय्यतें भी शुमार करना

जलाए रक्खूँगी सुब्ह तक मैं तुम्हारे रस्तों में अपनी आँखें
मगर कहीं ज़ब्त टूट जाए तो बारिशें भी शुमार करना

जो हर्फ़ लौह-ए-वफ़ा पे लिक्खे हुए हैं उन को भी देख लेना
जो राएगाँ हो गईं वो सारी इबारतें भी शुमार करना

ये सर्दियों का उदास मौसम कि धड़कनें बर्फ़ हो गई हैं
जब उन की यख़-बस्तगी परखना तमाज़तें भी शुमार करना

तुम अपनी मजबूरियों के क़िस्से ज़रूर लिखना वज़ाहतों से
जो मेरी आँखों में जल-बुझी हैं वो ख़्वाहिशें भी शुमार करना
 

3 दिन पहले

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