आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क़ासिम रसा: मैं गुनहगार अगर हूँ तो सज़ा दी जाए

उर्दू अदब
                
                                                         
                            मैं गुनहगार अगर हूँ तो सज़ा दी जाए
                                                                 
                            
वर्ना लोगो मुझे फिर दाद-ए-वफ़ा दी जाए

तुम मुझे चाहते हो चाहते हो तो साहिब
क्यों न ये बात ज़माने को बता दी जाए

एक चिंगारी बदल दे कहीं जंगल का मिज़ाज
इस से पहले ही तह-ए-ख़ाक दबा दी जाए

जो न रूठे उसे छाती से लगाना बेहतर
रूठने वाले को हँसने की दुआ दी जाए

शाम धुँदलाई हुई और भयानक जंगल
ऐसे माहौल में अब किस को सदा दी जाए

गर कोई रस्म बुरी है तो गवारा क्यूँकर
हर बुरी रस्म ज़माने से हटा दी जाए

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से 

https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o 

3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर