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Urdu Poetry: ख़्वाबों की चाँदनी का सरापा कहाँ से आए

उर्दू अदब
                
                                                         
                            ख़्वाबों की चाँदनी का सरापा कहाँ से आए
                                                                 
                            
जब जिस्म ही नहीं है तो साया कहाँ से आए

होंटों को सी लिया है तो नग़्मों का ज़िक्र क्या
पानी बँधा हुआ है तो धारा कहाँ से आए

सूरज तो शश-जिहत से दिखाता है आइना
दीवार मिल भी जाए तो साया कहाँ से आए

ये रात ये थकन ये उदासी ये तीरगी
ऐसे में कोई चाँद का टुकड़ा कहाँ से आए

एहसास तो मुझे भी है सूरज की प्यास का
जब ख़ून ही नहीं तो पसीना कहाँ से आए

'ताहिर' ये रहज़नों का लुटेरों का शहर है
तुम इस अँधेरी रात में तन्हा कहाँ से आए

~ ताहिर तिलहरी

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15 घंटे पहले

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