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Social Media Poetry: ढोल सुहाने लगे तभी तक जब तक दूर बजे

वायरल काव्य
                
                                                         
                            ढोल सुहाने लगे तभी तक जब तक दूर बजे।
                                                                 
                            

पल पल बदल रही जाने क्यों
संवादों   की    भाषा    शैली,
उत्तरोत्तर      संबंधों       की 
यमुना   होती   गयी   विषैली,

कुछ भाड़े के  झांझ मँजीरे हो मजबूर  बजे।

चित्र  पुराने  देखे ,सोचा ...!
ऐसे  तो   हम  लोग  नहीं थे
जितने पाल  लिए  हैं  तुमने
तुमको   इतने  रोग  नहीं  थे,

रोज़ रात को जगते बारह एक ज़रूर बजे।

कभी समय हो तो चल देना
साथ   हमारे    नदिया  तीरे
और सुनो घर रखकर आना
भाड़े के  सब  झांझ  मँजीरे

फिर स्वर सुनना धाराओं का ज्यों संतूर बजे।

साभार: ज्ञान प्रकाश आकुल की फेसबुक वाल से 

15 घंटे पहले

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