जानती तो सब हो तुम,
फिर क्यूं करती हो ख़ुद को परे
मन तुम्हारा बेचैन रहता है,
असंख्य ख़्वाब बुनता है
फिर भी रहती हो डरी डरी।
जब रचा था ये विश्व उसने,
तो नहीं बनाया था तुम्हें
यूं बिलखने को हरदम,
हर वक़्त अपने मन को मारकर
दूसरों की ख़ुशी
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