चलने को तैयार प्रभुजी, चलने को तैयार
निर्मोही संसार प्रभुजी, चलने को तैयार
खेला, खाया, धूम मचाया, खूब किया व्यापार
अब तो कर उद्धहार प्रभुजी, चलने को तैयार
धन-दौलत सब माया देखी, देखा जग-व्यवहार
पड़ा हूँ तेरे द्वार प्रभुजी, चलने को तैयार
जिया बड़े सलीक़े से मैं, किया है तुझसे प्यार
निर्भय-निर्विकार प्रभुजी, चलने को तैयार
खूब जिया जी भर के मैं तो, पाया सुख और सार
सौंप दिया सब भार प्रभुजी, चलने को तैयार
तुम बिन मेरा कौन है प्यारे, कौन है सच्चा यार
भवसागर कर पार प्रभुजी, चलने को तैयार
- © डॉ. रश्मि झा
rashmijha1909@gmail.com
हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X