आज 1 जुलाई है, कविवर लीलाधर जगूड़ी का 83वां जन्मदिन और हाल ही में उनकी नई पुस्तक ''मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं'' नई किताब प्रकाशन से आई है तो क्यों न उनके जन्मदिन के बहाने उनकी नई किताब की चर्चा की जाए। गीता में कृष्ण द्वारा कहा गया यह वाक्य उस अनंत के विस्तार की ओर इशारा करता है जो सदैव अगम्य, अननुमेय और अननुभूत है। यह संग्रह कवि की सृष्टि होने के कारण अगम्यता, अननुमेयता और अननुभूत भाषाई तत्वों का ऐसा ही समामेलन है जो हर बार लीलाधर जगूड़ी के काव्य विन्यास को नए रूपों की ओर ध्यान आकृष्ट करता है। उनसे जब बात कीजिए वे कविता के जन्म लेने के कई कारकों के पीछे ले जाते हुए कविता की सृष्टि और दृष्टि की मनोहरता की बातें करते हैं। वे महाभारत, रामायण और कई पुरा प्रसंगों में ले जाते हुए उस उक्तिवैशिष्ट्य को काव्य की धुरी मानते हैं जिसका उद्घोष कभी प्राकृत के किसी कवि ने कहा होगा : उक्तिविशेषं कब्बं। चिंता तब होती है जब लोग कविता को उक्तिवैचित्र्य का केंद्र बना देते हैं। जहां लोग अपनी ही रीतिबद्धता से मोहासक्त होकर उस जमी जमाई लीक को नहीं छोड़ते जिस पर वे बरसों से चलते आए हैं, जगूड़ी हर बार कविता के मौजूदा फार्मेट में अनुभव और संवेदना का नया गुल खिलाते हैं।
जगूड़ी अर्थ विस्तार के कवि हैं, वे न राजनीतिक हैं न किसी विचारधारा के वशीभूत। कविता को नए अर्थ के रोमांच से भरने में उनका कोई सानी नहीं। वे कविता के गर्भाशय से ज्यादा कविता के अर्थाशय पर ध्यान देते जान पड़ते हैं। किसी भंडाफोड़ शैली की कविता में कभी भी उनका यकीन नहीं रहा तथा वे यह जानते हैं कि कविता उतनी आसान नहीं जितनी जान पड़ती है। वे जानते हैं कि तरह तरह से कवि होने की और हर बार नयी कविता पाने की कीमत चुकानी पड़ती है। कविता के लिए नये अन्वय वाला गद्य पैदा करना वे कवि का धर्म मानते हैं। वे संग्रह के पूर्वकथ्य में कविता और छंद पर बात करते हुए जान पड़ते हैं पर वे तुक पर तुक बिठाने वालीकविता को श्रेय नहीं देते। कविता शब्दों के घटाटोप से ही निस्सृत हो, इस बात के विपरीत वे मानते हैं कि कविता को तमाम बार शब्दों और भाषा के विन्यास से बाहर भी उड़ान भरनी पड़ती है। तुक अतुक किसी भी कविता में हो या न हो, यह जरूरी नहीं पर सुर से बिना तौली हुई नहीं हो सकती। यह भी कि कविता किसी भी कथन में हो सकती है जो कि सुसंगत,सुग्राह्य और स्मरणीय सुरम्य उक्तियों से रचा गया हो।
समाज विडंबनाएं पैदा करता है तो कवि ही उसे देखने-परखने की दृष्टि देता है। वही मनुष्य या समाज के पतन को चिह्नित करता है। तभी तो जगूड़ी जैसा कवि कहता है : ''जाति के नहीं, मनुष्य होने की ओर आओ।'' हाल के वर्षों में जाति और जातीयता का बोलबाला बढ़ा है। मनुष्य के बजाय जाति का उत्थान हो रहा है। बल्कि वह इन दिनों लोकतंत्र को बचाने का एक अचूक माध्यम बना हुआ है। एक और कविता में जगूड़ी इस बात पर बल देते हैं कि ''अयोग्य को जाति मन बनने दो/ अयोग्यता को मत बनने दो इंद्रियों का गोत्र/कोई न कोई योग्यता पैदा करने में मदद करो अयोग्य की/ वह जाति विहीन होगा तो कम बोझ होगा/ जातीय बोध से बनी व्यवस्थाओं के लिए।'' (जाति विहीन) मुझे नहीं लगता जाति को लेकर जातीयता के प्रसार में लगी व्यवस्था और अयोग्यों जाति से चिह्नित करने को लेकर इतना स्पष्ट और मुखर किसी कवि ने कहा हो।
यह माना जाता है कि कवि का तो काम ही है, विडंबनाओं से नए अर्थ या अनर्थ तलाशना। यह काम उनका कवि मनोयोग से करता है। विड़बनाओं से अर्थ तलाशता है। उसे प्रकृति भी कुछ न कुछ सिखाती हुई सी लगती है जिससे गुजरते हुए वह कहता है : '' प्रकृति की उदारता और जिद से/ दोनों की हद से कुछ सीखो/ सीखने के लिए ही बना है जीवन।'' (कुछ से कुछ सीखो) ऐसी ही सीखों का जिक्र उन्होंने अपनी कविता 'स्त्रियों का पुरुषार्थ' में किया है जिसके अंत में वे कुबूल करते हैं कि ''परिवार की स्त्रियों ने बनाया मुझे तहजीबदार।'' जगूड़ी का कवि पग पग पर सूक्तियों-उक्तियों से खेलता हुई उन तुकों से भी तुक भिड़ाता चलता है जिन्हें वह तुकबंदी स्तर की क्रीड़ा से परे मानता है। तुकों से खेलने की यह अदा इन पंक्तियों में देखें --
शरीर में इतनी फुरकन भर जाती है
जब सुर्खन पत्रों पर भी चलने लगती है पुरखन हवा
तब आज की हवा चल जाती है। (प्रकृति के इशारे)
वे मौका आने पर परिस्थितियों पर तंज भी करते हैं। विचारधारा पर एक वक्र दृष्टि डालते हुए वे लिखते हैं :
विचार धारा की तरह
कहीं कहीं बची है चोटियों पर बर्फ
ठंड की तानाशाही
विचार धारा के बिना भी कायम है ।(विचार धारा)
जगूड़ी में परिहासबोध भी प्रबल रहा है। कविता को लेकर कठिन गद्य के हिमायती कवियों के लिए वे इसी बोध के नाते कह उठते हैं । इस कविता को पढ़ते हुए कविवर विष्णु खरे याद आ जाएं तो आश्चर्य नहीं। हो सकता है वे जीवित होते तो जगू़ड़ी की खासा खबर भी लेते। पर फिलहाल तो ये पंक्तियां ऐसे नीटोन्मुख और निरा गद्य उड़ेलने वाले कवियों पर :
जब तुम मद्य भी निर्जल लेते हो
तो कविता में इतना गद्य क्यों उड़लते हो
कविता भी नीट क्यों नहीं?
मजा तो तब है सारी विधाओं का अन्नकूट हो कविता में
सन्न करो कवि हमें विभाषा से
उक्तियों से हर पंक्ति को धन्न करो। (कवि मित्र)
इसी के साथ यह कविता भी देखें । इसमें तो विष्णु खरे पर साक्षात् कटाक्ष किया है --
कई बार शब्द चले आते हैं
सौंदर्य, अनुभव और अनुभूति से परे
जैसे विष्णु खरे।
जो आलोचकों को कहना चाहिए वह कभी कभी ऐसे परिहासबोध के साथ कोई कवि कह देता है। तभी तो कहा जाता है कविता हमारे समाज, समय और मनुष्य का क्रिटीक है।
उनकी कविताएं उनके अनुभवों का साक्ष्य हैं। दूर से सब कुछ सुहावना दिखाई देता है। इसी तरह खुद को दूसरों का सुख बेहतर दिखाई देता है। जबकि यह केवल प्रतीति भर है। हर किसी का जीवन हर किसी की प्रकृति एक दूसरे से अलग है। इस बात को वे एक कविता में कितनी खूबसूरती से कहते हैं--
जब घाटी से देखा तो सुंदर दिखता था
शिखर
जब शिखर पर हूँ तो ज्यादा सुंदर दिखती है घाटी
अपने से बाहर जहां भी देखो
दूसरा ही सुंदर दिखता है । (अपने से बाहर)
संसार परिवर्तनशील है । जो आज है वह कल न होगा। कल कुछ और होगा। नई हवा की झाड़ू कल की आबोहवा बदल देती है। वे लिखते हैं --
जो समाज आज है वह कल नहीं होगा
कल तो अचरज होगा लोगों को
आज के समाज पर (वह कल नहीं होगा)
जगूड़ी शुरू से ही उद्धरणीयता और तार्किकता के कवि रहे हैं। उनके यहां कुछ वाक्य सूक्तियों की तरह मुहावरों की तरह चमकते हैं। वे अनुगूंज की तरह दिलो दिमाग में छा जाते हैं। भूख के सौदागरों के लिए उनका यह कहना कितना सटीक है जैसे कि इस देश के पूंजीपति शोषकों के लिए --
भूख के व्यापारियों आप भूख नहीं जानते
भूख का मजा जानते हो
आपको कायदे की नहीं, फायदे की भूख है। (भूख के व्यापारी )
पीछे मैंने कवि को तुकों से खेलने वाला प्राणी कहा है। कवियों का काम ही है खेलना तुकों से छंदों से आवृत्तियों से, प्रतीतियों से, नए अर्थ की निष्पत्तियों से। जगूड़ी भी खेलते हैं। कायदे की नहीं फायदे की भूख। जैसे किसी कविता में ज्ञानेंद्रपति शब्दों से खेलते हुए लिखते हैं : मद्यगंधी मुंह और पद्यगंधी बातों वाले। शायद यह 'पोखरा पिशाचमोचन' की पंक्ति है। कवि शब्द भी नए बनाते हैं, जगूड़ी भी इस कला में हुनरमंद हैं। पीछे संस्कृत की पृष्ठभूमि जो रही है। तुकों के मोह में ही वे 'टहनी टहनी पर बैठ कर फुदकती इतराती हैं' से तुक मिलाते हुए 'छत्तों में खुशाती हैं ''कहते हुए इस बात का तोष अनुभव करते हैं कि 'खुश हो जाती हैं' का काम एकपदीय 'खु़शाती' से चला लिया। मितभाषिता भी और नए शब्द के उद्भावन का सुख भी। कवि ऐसे ही भाषा को मालामाल करता है। विद्यानिवास मिश्र ने भी निबंधों में कुछ नए क्रियापद बनाए थे जो बाद में चलन में आ गए।
पुन: कविता को लेकर जगूड़ी की बातों की ओर लौटूँ तो उनके साथ अनेक वार्ताएं याद आती हैं जब वे कविता को नई नई तरह से देख रहे होते हैं। जैसा कि वे भी मानते हैं, कविता उक्ति विशेष और कथन विशेष की वैचारिक प्रणाली है। वह विचार और भाषा का तात्विक मिश्रण भी है। इस अर्थ में उनकी कविता की पोशाक कभी ढीली ढाली नहीं रही, वह केवल शिल्प का सहारा लेकर नहीं चली, कथोपकथन, किस्सागोई, नाटकीयता, तार्किकता, ध्वन्यात्मकता और अंदाजेबयां से भी रची जाती रही है। कविता के लिए नए अन्वय वाला गद्य सदैव उनकी दृष्टि में रहा है।
कविता कल्पना और यथार्थ के कथ्य तथा भाषा के सौंदर्य से बनती है। यों तो संग्रह छोटी कविताओं से अँटा पड़ा है । पर इनमें भी ''एक बूँद'' जैसी कविता अपने प्रयोगों से विमुग्ध करती है। आज कविता में वृत्तांतों का बोलबाला कम हुआ है किन्तु नए अर्थ की निष्पत्ति के लिए कवि का उद्यम कम नहीं हुआ है। जगूड़ी भी उद्यमी कवि हैं। नए नए अर्थ पैदा करने की तीव्रता उनमें नये कवियों से भी ज्यादा दीख पड़ती है। पिछले संग्रह 'कविता का अमरफल' की तुलना में इस संग्रह की कविताएं कुछ अलग हैं। तथापि अपने आस्वादन में, नवाचार में जगूड़ी हर बार उस प्रयत्नसाध्य प्रविधियों का अनुगमन करते हैं जिससे कविता अपने अर्थविस्तार में नए क्षितिजों का अनुभवन करती हैं।
(समीक्षक हिंदी के सुधी कवि, समालोचक हैं।)
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4 वर्ष पहले
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