यह किस्सा वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब 'चेहरे' से लिया गया है।
यहां बात हो रही है शायर ताँबा झाँसवी की जिन्हें गीतकार इन्दीवर झाँसी से मु्म्बई ले आए थे। इन्दीवर वही हैं जिन्होंने फ़िल्मों में फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, चंदन सा बदन, कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे, तेरे चेहरे में वो जादू है और है प्रीत जहां की रीत सदा जैसे सुपरहिट गाने लिखे हैं। आगे पढ़ें इन दोनों के बीच का वाक़या बकौल निदा फ़ाज़ली
ताँबा के कहने के मुताबिक इन्दीवर उन्हें झाँसी के एक प्रोग्राम में मिले थे। वहाँ उन्होंने वादा किया था कि वह मुम्बई में उन्हें भी फिल्मों के गीत लिखने का काम दिलवाएँगे। इन्दीवर का वादा महज एक झाँसा था। वह तीन-चार दिन मुसलसल उनकी ग़ज़लें और नज्में अपने टेप रिकार्डर में टेप करते रहे जब उनके पास सुनाने को कुछ नहीं रहा तो यह कहकर रूख़्सत कर दिया कि अब आप जाइये, इन्दीवर जी जब बुलाएँ तभी आइये।
इन्दीवर के सिर पर बाल नहीं थे। इस गंजेपन को छिपाने के लिए उनके पास छोटी बड़ी दो विगें थी। वह हर आने वाले को पहले दरवाज़े में लगे सूराख से देखते थे। एक विग पहनकर वह मेहमान का सत्कार करते थे, दूसरी को पहनकर खुद ही घर में अपने न होने का इनकार करते थे। तांबा के साथ भी यही हुआ। जब वह एक दिन बाहर से बीड़ी लेकर इंदीवर के घर वापस लौटे तो इंदीवर इतनी देर में इनकार वाली विग अपने सर पर रख चुके थे। ताँबा मजबूरन अपने टीन का बक्स लेकर मुझे पूछते हुए मकतबा की तरफ चले आये।
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इन्दीवर का यह रवैया सिर्फ़ तांबा के साथ नहीं था
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