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Ramdarash Mishra Poem: बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे

कविता
                
                                                                                 
                            बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
                                                                                                

खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे।

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे-धीरे।

जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर,
वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे।

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी,
उठाता गया यूँ ही सर धीरे-धीरे।

न हँस कर न रोकर किसी में उडे़ला,
पिया खुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरे। आगे पढ़ें

5 months ago

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