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रामदरश मिश्र: मुझमें अभी भी एक नादान बच्चा है जो मुझे बूढ़ा नहीं होने देता

साहित्य
                
                                                         
                            अपनी धुन में रचना की सतत सक्रियताओं में खोए रहने वाले लेखक रामदरश मिश्र को 2021 के सरस्वती सम्मान से नवाजा गया है यह हिंदी जगत के लिए एक बड़ी खबर है। हिंदी के एक वृहत्तर लेखक संसार में रामदरश मिश्र को इस सम्मान के लिए चुना जाना इस बात का परिचायक है कि जीवन में पुरस्कार की रणनीति और उठापटक से अलग रहने वाले लेखकों पर भी चयन मंडल की निगाह रहती है। पहले यह लगता था कि प्राय: अकादमी या अन्य बड़े पुरस्कारों पर बड़े प्रकाशकों के प्रकाशनों का एक दबाव रहता है। उनकी लाबिंग होती है और प्राय: बड़े पुरस्कार उनके प्रकाशनों को मिलते हैं। रामदरश मिश्र को मिले साहित्य अकादमी और अब घोषित सरस्वती सम्मान ने यह सिद्ध किया है कि छोटे प्रकाशनों की भी पुरस्कार तंत्र में सुनवाई है।  ''मैं तो यहां हूँ''  जैसी काव्यकृति को यह सम्मान देकर फिर पुरस्कार तंत्र ने यह माना कि चाहे जितने उपन्यास कहानी संग्रह मिश्र जी के आ चुके हों, चाहे जितनी विधाओं में उनका अधिकारपूर्ण हस्तक्षेप हो, वे अंतत: और मूलत: कवि हैं। 
                                                                 
                            

हिंदी में अब तक हरिवंशराय बच्चन और गोविंद मिश्र के बाद वह तीसरे लेखक हैं जिन्हें सरस्वती सम्मान दिये जाने की घोषणा हुई है। पिछले दशकों में अकादेमी पुरस्कार को लेकर और अन्य पुरस्कारों को लेकर बहुत सी बहसें हुई हैं। हिंदी में अनेक बड़े लेखक हर वक्त होते हैं कि उन सबको पुरस्कृत नहीं किया जा सकता तथापि अनेक ऐसे भी लेखक हैं और रहे हैं जिन्हें यह पुरस्कार पाने के लिए लंबी प्रतीक्षाएं करनी पड़ी हैं। रामदरश मिश्र को ही अकादमी सम्मान तब मिला जब वे 92 वर्ष के थे। हिंदी के जाने माने कवि चिंतक कैलाश वाजपेयी को यह सम्मान उनके उत्तर जीवन में बहुत बाद में मिला जबकि उनके चिंतन की पृष्ठभूमि के साथ-साथ उनके कवि व्यक्तित्व का एक रौबदाब हिंदी समाज में रहा है लेकिन न सुधी आलोचक समाज ने , न पुरस्कार तंत्र ने उनके नाम की समय रहते सुनवाई की। बल्कि रामदरश मिश्र को तो अकादमी सम्मान मिलने पर उनकी उस मशहूर ग़ज़ल का शेर बारंबार दुहराया गया : जहां आप पहुंचे छलांगें लगा कर/ वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे धीरे। ---और यह बात जैसे आज फिर एक बार सिद्ध हुई कि धीरे-धीरे रचना के पथ पर अग्रसर रहते हुए भी बड़ा से बड़ा सम्मान हासिल किया जा सकता है। बिड़ला फांउडेशन ने उनके सक्रिय रहते सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इससे पूर्व उन्हें बिड़ला फाउंडेशन का व्यास सम्मान भी मिल चुका है। 


गोरखपुर उप्र में  15 अगस्त, 1924 को जन्मे, बनारस में पढ़े लिखे और गुजरात में कुछ वर्षों अध्यापन के बाद दिल्ली में आ बसे रामदरश मिश्र का कृतित्व कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, गद्य विधाओं-आलोचना, ललित निबंध, यात्रा वृत्तांत आदि में लगभग सौ से ज्यादा कृतियों में विन्यस्त है। उनकी तमाम महत्वपूर्ण रचनाएं दिल्ली में रहते ही लिखी गयीं। उनके लेखन में साहित्यिक मूल्यों को स्थापित करने वाले प्रगतिशील तत्व विद्यमान हैं। यह विगत सात दशकों के जीवनानुभवों का सुफल है। आज 98 की वय में भी वे लगातार सक्रिय और रचनात्मक बने हुए हैं, यह हिंदी का सौभाग्य है। उनकी कविताएं, कहानियां,उपन्यास, संस्मरण, यात्रावृत्त, आलोचनाएं  उनके रचनात्मक सामर्थ्य का प्रमाण हैं।  आगे पढ़ें

4 वर्ष पहले

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