दर्द कुछ कम न हुआ अपना दवा खाने से
ए'तिबार उठ गया हमदर्द दवा-ख़ाने से
वो कचहरी से बुलाते हैं कभी थाने से
हम भी वो ढीट हैं हड़के नहीं हड़काने से
इस बुढ़ापे में लगाया है उन्हों ने सुर्मा
बाज़ आते नहीं वो अब भी सितम ढाने से
उन के अब्बा को रक़ीबों ने बहुत भड़काया
वो तो अच्छा हुआ भड़के नहीं भड़काने से
न उठा पाए वो मटका तो उन्हों ने हम को
कभी आँखों से पिलाई कभी पैमाने से
वो न जागे कि ज़रा जागती तक़दीर मिरी
और सब जाग उठे खाट के सरकाने से
मेरी लुक्नत ने मुझे वस्ल से रक्खा महरूम
बात बन बन के बिगड़ती रही हकलाने से
मच्छरों ने भी रक़ीबों की तरह ख़ून पिया
हम शब-ए-वस्ल न फ़ारिग़ हुए खुजलाने से
ये न आदत है हमारी न ये फ़ितरत वैसे
उज़्र 'मसरूर' को हरगिज़ नहीं नज़राने से
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