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मैं भारत का संविधान हूं, लालकिले से बोल रहा हूं : डॉ. हरिओम पंवार

डॉ. हरिओम पंवार की मसङूर कविता
                
                                                         
                            मशहूर कवि हरिओम पंवार मूलत: वीर रस के कवि हैं। अपनी प्रस्तुतियों के लिए जाने जाते हैं। जब अपनी कविताओं का पाठ करते हैं तो युवाओं के मन में जोश आ जाता है। मैं भारत का संविधान हूं, लाल किले से बोल रहा हूं....उनकी बहुत मशहूर कविता है। 
                                                                 
                            

मैं भारत का संविधान हूं, लालकिले से बोल रहा हूं
मेरा अंतर्मन घायल है, दुःख की गांठें खोल रहा हूं।।
मैं शक्ति का अमर गर्व हूं
आजादी का विजय पर्व हूं
पहले राष्ट्रपति का गुण हूं
बाबा भीमराव का मन हूं
मैं बलिदानों का चन्दन हूं
कर्त्तव्यों का अभिनन्दन हूं
लोकतंत्र का उदबोधन हूं
अधिकारों का संबोधन हूं
मैं आचरणों का लेखा हूं
कानूनी लक्ष्मन रेखा हूं
कभी-कभी मैं रामायण हूं
कभी-कभी गीता होता हूं
रावण वध पर हंस लेता हूं
दुर्योधन हठ पर रोता हूं
मेरे वादे समता के हैं
दीन दुखी से ममता के हैं
कोई भूखा नहीं रहेगा
कोई आंसू नहीं बहेगा
मेरा मन क्रन्दन करता है
जब कोई भूखा मरता है
मैं जब से आजाद हुआ हूं
और अधिक बर्बाद हुआ हूं
मैं ऊपर से हरा-भरा हूं
संसद में सौ बार मरा हूं

मैंने तो उपहार दिए हैं
मौलिक भी अधिकार दिए हैं
धर्म कर्म संसार दिया है
जीने का अधिकार दिया है
सबको भाषण की आजादी
कोई भी बन जाये गांधी
लेकिन तुमने अधिकारों का
मुझमे लिक्खे उपचारों का
क्यों ऐसा उपयोग किया है
सब नाजायज भोग किया है
मेरा यूं अनुकरण किया है
जैसे सीता हरण किया है।
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5 वर्ष पहले

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