ओ धरती, मेरा घर, मेरा स्थान
समंदर के घेरे में एक विसंगत जहान
ओ धरती, क्या तुम धूल का एक कण हो
एक पिंड, बस कुछ क्षण हो
एक धातु का टुकड़ा
जिसका ज़ंग लक्षण हो
पदार्थ, कोई शून्य में स्थित है जैसे
एकाकी विमान, कोई तारा उपस्थित है जैसे
किसी चट्टान सी शीतल बिना किसी रंग के
साथ है जुड़ी हुई बिना किसी ढंग के
कुछ तो है जो ये कहता है कि सच नहीं
मेरी प्रिय! कोमल और नीला रंग यही
गहराई में यूं बसी हो
मेरे मन में हो पूर्ण
हवाओं से भरी, दुलार से परिपूर्ण
संगीत से भरी, आत्मा में संपूर्ण
धमनियों में अपनी, महसूस किया है ये रहस्य
समय के आंगन में, इतिहास के सदृश
सदियों के जीवन-गीत मेरे रक्त में हैं
बाढ़ और ज्वार के गीत मेरे ह्रदय में हैं
धुंधले बादल, बिजली और अशांत तूफ़ान
मेरे ही रूप, जैसे मेरे ही प्राण
मैंने चखा है नमकीन, तीखे और मीठे का स्वाद
सामने आए हर जुनून का ताप
उपद्रवी रंग और ख़ुश्बू भी
तमाम इन्द्रियों की जुस्तजू भी
तुम्हारे सौंदर्य में मैंने जाना है कि कैसे
समय के परे ख़ुशी, इसी क्षण में है जैसे
ओ धरती, करुणामयी और नील
संपूर्ण ह्रदय से कहता हूं
कि प्रेम तुम ही से करता हूं
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