अशोक के इस बाग में,
किसने फैलाया शोक?
तने को ही चुभ रही है,
तेज पंखुड़ियों की नोक!
तुम्हारा जाना सामान्य नहीं,
खुशी के युग का है अंत!
संवाद भी हो रहा असहनीय,
मन भी अंदर से है आक्रांत!
मंगेश के मंदिर में,
शांत हो गया ओंकार!
घंटी के बजाने पर भी,
देखो नहीं है कोई शोर!
कौन किसे सांत्वना दें,
तुम ही मुझे बताओ?
आंसुओं में छिप गया है,
जैसे हर तरह का घाव!
कोई भी भाव ऐसा नहीं,
जो कंठ से न कराया दर्ज!
हर तरह के गाने से चढ़ाया
पीढ़ियों पर सप्तसुरी कर्ज!
दुस्साहस से "लता" शब्द
को अगर दिया उलट!
वो भी हो "ताल" बनकर
बन जाता है संगीत!
भैरवी का टूट गया है बांध,
हर आंख में भरा पानी है!
विक्षिप्त से सातों सुरों को,
है अपनी दीदी को तलाश!
दीनानाथ को स्वर्ग में
है बेटी का इंतजार!
वह भी संतोष से चलीं,
आलौकिक सुरों के साथ!
आज क्षितिज पर भी,
उगा नहीं है कोई सूरज!
दसों दिशाएं भी देखों,
अंधेरे में गई है डूब
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मूल मराठी कविता
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