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नील कमल की कविता: यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है

नील कमल की कविता: यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है
                
                                                         
                            सरक रहे हैं 
                                                                 
                            
पौरुषपूर्ण तनों के कंधों से 
पीतवर्णी उत्तरीय 

ढुलक रही है 
अलसाई टहनियों के माथे से 
हरी ओढ़नी 

एक थके पड़े के उघड़े सीने पर 
फूली नसों-सी शाखाएँ 
पढ़ी जा सकती हैं,अक्षरों-सी 

ये फागुन के चढ़ते हुए दिन हैं 
बौराए आम के सिर पर 
उग रही है कलँगी 

उदास नीम पर आ गए हैं 
गुच्छों में फूल, 
उजाड़ पेड़ पर कूकती है 
बेफ़िक्र एक कोयल 

यह पेड़ों के कपड़े बदलने का 
समय है, 
एक बीतता हुआ संवत् 
अब जल उठेगा, धरती के कलैंडर पर 

ढोलक की थाप पर 
साल का पहला चैता गाकर 
लौटेंगे लोग गाँव की तरफ़ 
अब बदल जाएगा मौसम, 
तैयार होंगे पेड़ 
जेठ के उदास दिनों की 
लंबी दुपहरिया के लिए। 
4 वर्ष पहले

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