शाख़-दर-शाख़ होती है ज़ख़्मी
जब परिंदा शिकार होता है
- इन्दिरा वर्मा
देख कर इंसान की बेचारगी
शाम से पहले परिंदे सो गए
- इफ़्फ़त ज़र्रीं
टहनी पे ख़मोश इक परिंदा
माज़ी के उलट रहा है दफ़्तर
- रईस अमरोहवी
परिंदा शाख़ पे तन्हा उदास बैठा है
उड़ान भूल गया मुद्दतों की बंदिश में
- खलील तनवीर
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