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किस्सा मजेदार : जब फ़िराक़ गोरखपुरी के इस जवाब पर हरिशंकर परसाई हो गए थे नर्वस

Firaq Gorakhpuri
                
                                                         
                            ‘कुछ और भी तो हो इन इशारात के सिवा
                                                                 
                            
यह सब तो ए निगाहें करम बात बात बात 
इक उमर कट गई है, तेरे इंतजार में
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिनसे एक रात
अजीबतरीन तो इतना है कि 
दिल ही में कोई रह-रह के झिझक उठता है 
सुनते हैं इश्क़ ज़माने में है बदनाम बहुत 
आ ही जाती है मगर फिर भी मिटे दर्द की याद 
गरचे है तर्के मुहब्बत में भी आराम बहुत' 


फ़िराक साहब नयेपन के बडे़ मुरीद हैं । पुराने ढर्रे-ढब से ही नहीं अपने ही ज़माने में चल रहे फैशन से भी अपने आपको बचाना उनकी ख़ास अदा रही है ।

इक जानी हुई दुनिया इक आलमे हैरत है 
इन दोनों का मिल जाना दुनियाए मुहब्बत है 


फ़िराक़ जब यह शेर फरमाते हैं, तो बहुत ही पुरज़ोर लफ़्ज़ों में अपनी ग़ज़लों को किसी आसमानी ताक़त और ग़ैर दुनियावी मामलों से जोड़कर देखने से बरजते हैं। उनके मुताबिक़ ये ग़ज़लें वही या इल्हाम नहीं हैं। ख़ुदा या ज़िब्रील से इनका कोई ताल्लुक़ नहीं । न अर्श व कुद्श (पवित्रता) से इसका कोई वास्ता है। उनके हिसाब से उनकी 'ग़ज़लें’ इस मानूस तरीन व अजीबतरीन दुनिया-ए मुहब्बत के कुछ अधसुने राग हैं। 

फ़िराक़ लिखते हैं, "शायरी में मेरी कोशिश रही है कि इस इन्तहात पज़ीर दौर के असरात से जहाँ तक मुमकिन हो सके बचूँ जिसमें उर्दू शायरी ने आँखें खोली और जिसमें बह अब से कुछ दिन पहले तक साँस लेती रही।" यह नयापन ही फ़िराक़ से यह कहलवाता है - 

पैदा करे ज़मीन नई आसमान नया 
इतना तो ले कोई असरे दौरे कायनात 
अहले रज़ा में शाने बग़ावत भी हो ज़़रा 
इतनी भी ज़िंदगी न हो पाबन्दे रस्मियात 


लेकिन यह नयापन क्या ? क्या फ़क़त कहने के लहज़े से ही नयापन लाया जा सकता है?  शायद नहीं। और फ़िराक़ साहब के यहाँ नयापन बहुत बड़े मक़सद के साथ मौजूद था । वे हिंदुस्तान की शायरी में हिन्दुस्तानियत के बहुत बड़े पैरोकार थे।

उनके अनुसार फ़ारसी अरबी शायरी के अदब से थोड़ा बहुत मुतास्सिर हो लेना और बात है, लेकिन शायरी हिन्दुस्तान की और उसकी जडे़ं और बुनियादें मक्के मदीने या शीराज़ में, यह मेरे गले नहीं उतरती। वे चाहते थे कि उर्दू अरब व शायरी में हिंदुस्तानियत और बुलंदतरीन हिन्दुस्तानियत इसी तरह कूट-कूट कर भर दी जाय जैसे जर्मन अदब में जर्मानियत रुसी अदब में रुसियत और टैगोर की शायरी में और प्रेमचंद के अदब में हिंदुस्तानियत। 
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9 महीने पहले

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