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रूसी कवि अलेक्सान्द्र ब्लोक की कविता 'शहर के अंधियारे विस्तार के पीछे'

The poem 'Behind the dark expanse of the city' by Russian poet Aleksandr Blok
                
                                                         
                            शहर के अंधियारे विस्तार के पीछे
                                                                 
                            
खो गई थी सफेद बर्फ
अंधकार से हो गई थी मित्रता
धीमे हो गए थे मेरे कदम।
 
काले शिखरों पर
गड़गड़ाहट लाई थी बर्फ
उठ रहा था एक आदमी
अंधकार में से मेरी तरफ।
 
छिपाता मुझसे अपना चेहरा
निकल गया वह तेजी से आगे
उधर जहाँ खत्म हो चुकी थी बर्फ
जहाँ बची नहीं थी आग।
 
वह मुड़ा -
दिखी जलती हुई एक आँख मुझे।
बुझ गई उसकी आग
ओझल हो गया बर्फ से घिरा जल।
 
मिट गया पाले का छल्ला
जल के शांत प्रवाह में।
लज्जा की लाली छाई कोमल चेहरे पर
और आह भरी ठंडी बर्फ ने।
 
मुझे मालूम नहीं - कब और कहाँ
प्रगट हुआ और छिप गया -
किस तरह गिर पड़ा पानी में
वह नीला सपना आकाश का।
 
अनुवाद : वरयाम सिंह, साभार : हिन्दी समय
4 वर्ष पहले

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