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प्लास्टिक इंकः द सीेक्रेट हिस्ट्री एंड शॉकिंग फ्यूचर ऑफ़ बिग ऑयल्स बिगेस्ट बेट

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दर्द देने वाले ही दवा दे रहे हैं

प्लास्टिक इंकः
द सीेक्रेट हिस्ट्री एंड शॉकिंग फ्यूचर ऑफ बिग ऑयल्स बिगेस्ट बेट
लेखक : बेथ गार्डिनर
प्रकाशक : एवेरी
मूल्य : 2,510 रुपये (हार्डकवर)

सार
हाल ही में प्रकाशित यह किताब कई चौंकाने वाले खुलासों से भरी है, जिनमें यह भी शामिल है कि कैसे बड़ी तेल कंपनियों ने प्लास्टिक को हमारे जीवन में धकेल दिया और फिर हमारी चिंताओं को कम करने के लिए पुनर्चक्रण का मिथक सुझाया।

विस्तार
हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में प्लास्टिक हर जगह मौजूद है। पर इसे बनाने वाली बड़ी कंपनियां हमारी नजरों के सामने होते हुए भी छिपी हुई हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि प्लास्टिक आखिर में पहुंचता कहां है, इस पर तो बहुत चर्चा होती है, लेकिन यह आता कहां से है, इस पर बहुत कम बात होती है।

एक चौंकाने वाली गहन पड़ताल में, जो पात्रों पर आधारित कहानियों से भरी है, पत्रकार बेथ गार्डिनर ने इस विशाल और लालची उद्योग की सच्चाई उजागर की है, जो हमारी दुनिया को प्लास्टिक से भर रहा है और अब पहले से कहीं अधिक प्लास्टिक बनाने की तैयारी में है। वह लिखती हैं कि यह कोई राज की बात नहीं है, बल्कि यह तो इस उद्योग की खुले तौर पर घोषित योजना है। टेक्सास के गल्फ कोस्ट से लेकर एंटवर्प की तंग गलियों और दुबई की चकाचौंध तक, गार्डिनर हमें इस उद्योग की लगातार बढ़ती रफ्तार, उसके जबर्दस्त मुनाफे, जहरीले प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को और भी बदतर बनाने में उसकी भूमिका की झलक दिखाती हैं। उनका तर्क है कि आज यह उद्योग प्लास्टिक उत्पादन को दोगुना-तिगुना करने की योजनाओं पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है।  

20वीं सदी के मध्य के आसपास, कंपनियों को यह एहसास हुआ कि वे इस सामग्री से घर-गृहस्थी की कोई भी चीज बना सकती हैं। इसके लिए प्लास्टिक बनाने वालों को ‘इस्तेमाल करो और फेंको का फायदेमंद आइडिया’ ईजाद करना पड़ा। फिर कंपनियों ने एक ऐसी पीढ़ी को फुसलाना शुरू किया, जिसने महामंदी और युद्ध के वर्षों की किफायत को झेला था; उन्हें यह समझाया गया कि बाजार में प्लास्टिक की जो काफी टिकाऊ चीजें भर गई हैं, उन्हें ‘बिना दूसरी बार सोचे’ ही फेंक देना चाहिए।

आज ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाली सोच पूरी दुनिया में फैल चुकी है। कुल प्लास्टिक का आधा हिस्सा ऐसी चीजों से बनता है, जिन्हें सिर्फ एक बार इस्तेमाल किया जाता है और फेंक दिया जाता है। अमेरिकी शहरों ने इस बदलाव को कचरा-प्रबंधन के संकट के तौर पर देखा, पर प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियों को इस नए बोझ की जिम्मेदारी उठाने के लिए मजबूर नहीं किया गया। इसके बजाय, प्लास्टिक कंपनियों के पैसे से चलाए गए विज्ञापन अभियानों ने लोगों को यह यकीन दिलाने की कोशिश की कि कचरे की इस समस्या के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। प्लास्टिक इंक कई चौंकाने वाले खुलासों से भरी है, जिनमें यह भी शामिल है कि कैसे बड़ी तेल कंपनियों ने प्लास्टिक को हमारे जीवन में धकेल दिया और फिर हमारी चिंताओं को कम करने के लिए पुनर्चक्रण का मिथक सुझाया और कैसे उन्होंने एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंधों का विरोध करने के लिए धन और राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया। गार्डिनर उन वस्तुओं में मौजूद रसायनों के कारण उत्पन्न छिपे हुए स्वास्थ्य संकट का भी खुलासा करती हैं, जिनका हम हर दिन उपयोग करते हैं, और वैज्ञानिकों के इस बढ़ते डर को भी उजागर करते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक और भी अधिक खतरे पैदा कर सकते हैं।

प्लास्टिक इंक  एक ऐसे उद्योग का असाधारण पर्दाफाश है, जो मुनाफे की अपनी बेतहाशा भूख को मिटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

एक दिन पहले

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