वकीलों के ख़ानदान से आने वाले आनंदनारायण मुल्ला एक मशहूर शायर हुए। मूल तौर पर कश्मीरी ब्राह्मण आनंदनारायण का जन्म लखनऊ में हुआ था। उन्होंने शायरी में किसी को उस्ताद नहीं बनाया क्यूंकि उनका विश्वास था कि उस्ताद के विचारों की छाप शिष्य पर पड़ती है और शिष्य के निजी भाव, विचार और व्यक्तित्व सब कुछ नष्ट हो जाता है।
मुल्ला यूं तो ब्राह्मण कुलोत्पन्न हैं किन्तु वह कभी संप्रदाय के झगड़े में नहीं पड़े इसलिए वह फ़र्माते हैं कि -
मैं फ़क़त इंसान हूं, हिन्दू-मुसलमां कुछ नहीं,
मेरे दिल के दर्द में तफ़रीक़े-ईमां कुछ नहींं
किताब ‘शाइरी के नए दौर’ में गोयलीय बताते हैं कि जब आनंदनारायण मुल्ला को इक़बाल की शायरी में भेद-भाव मिला तो वह बेचैन हो उठे। हालांकि वह इक़बाल की शायरी से काफ़ी प्रभावित हुए थे। किन्तु जब इक़बाल वतन और प्रीति के गीत गाते-गाते मजहबी प्रलाप करने लगे तो आनंदनारायण से रहा न गया और वह व्यथा से कराह उठे, तब उन्होंने लिखा
तू भूल गया अपने नग़्मे कुछ फ़र्क़ मेरे कानों में नहीं
तासीर जो दिल पर करती थी, वो लय ही तेरी तानों में नही
एक जगह वह लिखते हैं कि -
तुझे मज़हब मिटाना ही पड़ेगा रूए-हस्ती से
तेरे हाथों बहुत तौहीने-आदम होती जाती है
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