अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। इस कड़ी में आज कवि, अनुवादक और लेखक विश्वनाथ की रचनात्मक यात्रा पर प्रकाश डाल रहे हैं- डाॅ. ओम निश्चल।
हिंदी के उत्थान और प्रचार प्रसार में केवल लेखकों का ही नहीं, प्रेस और प्रकाशनों का भी बड़ा योगदान रहा है। हिंदी के प्रचार प्रसार के एक बड़े नियामक विश्वनाथ जी हैं जो 1920 में लाहौर में जन्मे। जिन्होंने लाहौर में 1912 में स्थापित राजपाल एंड संस प्रकाशन को आज हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय एवं अग्रणी प्रकाशन में बदल दिया है। वे प्रकाशक ही नहीं, एक कवि भी थे। यह वर्ष उनका जन्मशताब्दी वर्ष है। सूफी शायर रूमी के काव्य का अनुवाद भी उन्होंने किया है। अपने समय के कितने ही बड़े लेखकों, उपन्यासकारों, कवियों से उनके घनिष्ठ संबंध रहे हैं । देश के बॅटवारे के फलस्वरूप सन 1947 में यह प्रकाशन दिल्ली आ गया।
मूलत: प्रकाशक होते हुए भी विश्वनाथ भीतर से एक लेखक थे, कवि थे, अनुवादक थे तथा साहित्य और संस्कृति के प्रहरी थे। उनके प्रकाशकीय निर्देशन का ही यह कमाल है कि यहां से दिनकर, महादेवी वर्मा, बच्चन, अज्ञेय, शिवानी, आचार्य चतुरसेन, अमृत लाल नागर, विष्णु प्रभाकर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, रांगेय राघव, कमलेश्वर, कन्हैयालाल नंदन जैसे बड़े लेखक छपे तो आर के नारायण, रस्किन बांड, मुल्कराज आनंद, खुशवंत सिंह, जसवंतसिंह, देवदत्त पटनायक एवं जे कृष्णमूर्ति की पुस्तकों के हिंदी अनुवाद भी। कोश व शब्दकोश के मामले में भी यह प्रकाशन अग्रणी रहा है।
विश्वनाथ जी फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स के अध्यक्ष रहे हैं वे लेखकों से अपने संबंधों को कभी शिथिल नहीं होने दिया। इसके अलावा वे डीएवी के सैकड़ों संस्थानों के नीति निर्धारण और प्रबंधन से भी जुडे़ थे तथा समाज सेवा की तमाम इकाइयों में उनकी सघन सहभागिता रही है। अपने पिता राजपाल जी की किशोर वय में ही एक मतांध कट्टरवादी द्वारा हत्या कर दिए जाने के कारण विश्वनाथ को छोटी उम्र में ही प्रकाशन को चलाने का कटिबद्ध निर्णय लेना पड़ा जिससे उनकी सुदृढ़ कारोबारी क्षमता भी प्रमाणित होती है।
एक साहसिक प्रकाशक के तौर पर उन्होंने अपने समय के बड़े लेखकों को अपने प्रकाशन से जोड़ा। लेखकों कवियों से संसर्ग का यह परिणाम हुआ किउनके भीतर का कवि भी जागने लगा। 'अंतरा' उनकी कविताओं का पहला संग्रह था जो 2007 में आया और जिसमें उनकी हाइकू शैली की कविताएं शामिल हैं । शब्दों की मितव्ययिता के साथ विचारों की सघनता का जो ललित प्रवाह उनके यहां मिलता है वह उन्हें एक चिंतक की छवि से मंडित करता है।
उनके व्यक्तित्व में एक दार्शनिक की छाया भी दिखती रही है। उन्होंने अपने समय की सचाई को कम से कम शब्दों में लेकिन प्रभावी शैली में व्यक्त किया है। उनकी कविताओं का दूसरा संग्रह 'आलाप' 2011 में आया जो संवेदना की दृष्टि से अत्यंत घनीभूत है । यह आलाप जैसे कवि ने स्वयं से किया है। राग विराग और सौंदर्य के शाश्वत प्रतिमानों की छाया इन कविताओं में दिखाई पड़ती है। वे इसकी भूमिका में कहते हैं कि ''मेरी कविताएं स्वांत:सुखाय लिखी गयी हैं। दिल से लिखी गयी हैं। 'आलाप' मेरी अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति, मनोभावों का काव्यात्मक चित्रण, भोगे हुए यथार्थ की कविताएं हैं।''
उनकी कविताओं के बारे में हिंदी के ख्यात कवि कुंवर नारायण जी कहते हैं कि ''इन कविताओं में उद्विग्नता का आवेश नहीं, धैर्य और संयम की गरिमा है तथा इनमें ईमानदारी से जिये,सोचे और समझे जीवन का सहज स्वीकार है।'' जाने माने आलोचक डॉ इंद्रनाथ चौधरी को इनमें जीवन की लयात्मकता और दार्शनिक अतलस्पर्शिता नज़र आती है। वे कहते हैं कि ''अनवरत बहती नदी की कलकल ध्वनि में वे बहुत कुछ सुन पाते हैं। हवा को महसूस करते हैं। उनकी रोमानी संवेदना की अदभुत अर्थ छवियां केवल चौंकाती नहीं, हमारे अंतर्मन में नए रंग भरती है। यह रोमानियत उनकी कल्पना का संसार रचती है।''
जहां तक विश्वनाथ के कवि व्यक्तित्व का प्रश्न है, वह उनकी कई पुस्तकों, अंतरा, आलाप , म्यूजिंग्स, और रूमी की कलामों के काव्यात्मक अनुवाद से प्रमाणित है। विश्वनाथ बहुत बारीक अनुभूतियों व प्रेक्षणों के कवि थे। उन्होंने यों तो जो विषय अपनी कविताओं के लिए चुने वे आमफहम ही हैं फिर भी आंसू की एक बूँद, प्रकृति पुत्र, दिगंबर, देवदूत, चिड़िया सी आकांक्षा, आलाप, अहमस्मि, यह कैसा संबंध, आजन्म बंदी, असीम आकाश, जाग उठा है ज्वालामुखी, दुख की दहशत, इस छोटे से कण में, नींद क्यों रात भर नहीं आती, मौन की मार, किसका बुत,एक बूंद जल, हिमपात, अभिशाप जैसी कविताओं में विश्वनाथ जी के कवि मन का जायज़ा लिया जा सकता है। उन्होंने कुछ कविता श्रृंखलाएं भी लिखी हैं जैसे शब्द- 1,2,3, सागर संगीत-1,2,3 एवं प्रणय गीत- 1,2,3,4,5,6 उनका दार्शनिक मन कहता है, '' अब एक सी कामना है मेरी/ कोई कामना न रहे/ काम करता रहूँ, कामना नहीं। ( आलाप, पृष्ठ 13) आंसू की एक बूँद कविता में विश्वनाथ लिखते हैं -
उसके गाल पर छलकी आंसू की पारदर्शी बूँद में
पढ़ी जा सकती है
उसके जीवन की लंबी व्यथा-कथा
विश्वनाथ एक आस्थावादी इंसान थे। यह आस्था और उपस्थिति उनकी कविताओं के मूल में है। एक कविता 'आजन्म बंदी' में वे उस घेरेबंदी का ज़िक्र करते हैं जो इंसान के चारों ओर लिपटी होती है। हर व्यक्ति को ऐसी आस्थाओं के घेरे में रहना होता है बेशक उसकी सांस ही क्यों न घुट जाए। देखें कविता -
खुल कर सांस लेना भी
कठिन हो रहा है
घिरा हुआ हूं
सब ओर से
अपनी प्रतिबद्धताओं से
आजन्म बंदी के समान (आलाप, पृष्ठ 46)
इन कविताओं में एक नैतिक आत्मसंघर्ष के सबूत भी दिखते हैं। यह नैतिकता आस्थावादी व्यक्ति की एक बड़ी ताकत होती है। वे जीवन मूल्यों के कवि थे इसलिए महसूस करते थे कि जो उनसे नहीं हो पा रहा उसका एक नैतिक दबाव उनके मन पर पड़ता है। तभी तो वे 'विवशता का दंश' में कहते हैं -
अपनी ही विवशता का
स्वयं होना पड़ता है साक्षी कभी कभी
क्यों नहीं विरोध कर पाया उसी समय
प्रतिवाद तो कर ही सकता था
बस, मूकद्रष्टा की भांति
जड़ वृक्ष बना खड़ा रह गया
अपनी ही इस विवशता का दंश
साल रहा है अब तक (आलाप, पृष्ठ63)
व्यक्तिवादी होते समय को वे स्वयं महसूस करते थे कि कैसे आदमी कुल मिला कर मैं-मैं के अहम में बदल गया है। इस छोटे से अक्षर 'मैं' पर लिखते हुए वे कहते हैं -
मैं कर्ता हूँ मैं भर्ता हूँ मैं पति हूँ मैं यति हूँ
मैं ज्ञानी हूँ मैं दानी हूँ
मैं उद्योगपति हूँ मैं करोड़पति हूँ
मैं कलाकार हूँ मैं रचनाकार हूँ
मैं विधायक हूँ मैं निर्णायक हूँ
छोटा सा अक्षर मैं
और इतनी ' टैं ' (वही, पृष्ठ 55 )
पर एक दूसरी कविता में वे इस अहं की व्यक्ति के निर्माण में एक भूमिका भी स्वीकार करते हैं -
अहं है तो मैं हूँ
मैं हूँ तो मेरी अस्मिता है
मेरा अस्तित्व है
जीवन की क्षण भंगुरता पर भी विश्वनाथ जब 'कल्पना करो' जैसी कविता लिखते हैं तो मुझे कुंवर नारायण की एक कविता याद आती है, कल्पना करो तुम जीवन के अंतिम परिच्छेद में हो---विश्वनाथ की कविता 'कल्पना करो' कुछ इससे भी दो कदम आगे की बात करती है -
कल्पना करो आज संसार से विदा हो चुके हो
फिर सोचो
अगली सुबह का परिदृश्य क्या होगा
रोना धोना थम चुका होगा
अपने अपने काम में लग रहे होंगे सब
पहले की तरह ही दुनिया चल रही होगी
घर बार भी, कामकाज भी
जितना जितना संबंध
उतना उतना दुख
मिर्जा गालिब ने ठीक ही कहा है
'गालिबे-खस्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं' (आलाप, पृष्ठ 126)
उन्होंने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी में भी कविताएं लिखीं तथा उसे अपने एक अन्य संग्रह म्यूजिंग्स में शामिल किया। वे इसकी एक कविता में कहते हैं, मैं एक बोनसाई की तारीफ नहीं कर सकता क्योंकि जड़ों और शाखाओं को हर दूसरे दिन काटते छांटते रहना प्रकृति को उसके अनुसार आचरण नहीं करने देना है। भीड़ में घिरे होने पर उन्हें ऐसा लगता है कि यह भीड़ है जो चल रही है वे नहीं। (म्यूजिंग्स, पृष्ठ 22 ) आज तो मास्क का अनिवार्य माहौल है कोरोना महामारी के कारण; पर एक ऐसी कविता में वह पहले ही लिख चुके हैं -
मैं कौन हूँ
यह मास्क मेरे चेहरे पर क्यों
मेरे असली चेहरे को सामने आने दीजिए और
मुझे सामना करने दीजिए
पर क्या मैं सामना करने योग्य हूँ (म्यूजिंग्स, पृष्ठ 13 )
म्यूजिंग्स की सारी कविताएं छोटे आकार की हैं। कुछ तो महज तीन पंक्तियों भर की। पर वे सीप में पड़ी मोती की तरह हैं। मोती जैसे अनुभव जिसे उन्होंने अपने कवि व सार्वजनिक जीवन में अनुभव से हासिल किया था। विदिन मी, दिस डे, आई हैव शट टाइट, ए सिंगल लीफ, मैन इज अ रीवर, सूर्य उगता है, आई एम हिंदू, ए टारट्वाइज, ब्लैक स्पाट्स, साइबेरियन क्रेन्स, हू इज ही, लेट मी लिव, आई एम ए स्लेव, माई सिटी जैसी तमाम कविताऍं इसका साक्ष्य हैं।
विश्वनाथ ने सूफी चिंतक रूमी के कलामों का अनुवाद भी किया है। यही वजह है कि उनकी शायरी में जबर्दस्त दिलचस्पी थी । रांगेय राघव के शेक्सपियर के नाटकों के किए अनुवाद भी काफी लोकप्रिय रहे। रूमी के कलाम भी जीवनानुभवों की उपज हैं । रूमी के कलामों के कुछ अनुवाद देखें कैसे अनुभव की आंच में भीगे हुए हैं -
दिल से जो पुकार उठती है
वही असली आवाज़ है
बाकी जो कुछ सुनाई देता है
वह उसी की अनुगूँज है
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अपने इन कानों में
रुई भर लो
तभी सुन पाओगे
अंतरात्मा की आवाज़।
**
महान संतों ने तुम्हारे लिए ही
मोमबत्तियां जला रखी हैं
ताकि तुम्हारे रास्ते का अंधेरा
दूर हो पाए
**
शरीर तो आत्मा का आवरण है
वैसे ही जैसे बच्चे के लिए
मां का ऑंचल । (रूमी, पृष्ठ 76 )
सच कहें तो विश्वनाथ एक कारोबारी थे। कर्मण्डेयाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। अच्छे साहित्य व जीवन मूल्यों से बंधे लेखन के वे हामी थे। उन्हें अच्छे बुरे लेखकों का पूरा इल्म था। एक प्रकाशक एक कवि और सूफी अवधारणाओं के हामी के रूप में विश्वनाथ ने जो काम हिंदी पुस्तकों के हित में संभव किया है वह आने वाली शताब्दियों एक अमिट हस्ताक्षर के रूप में मौजूद रहेगा।
(लेखक हिंदी के सुधी कवि व समालोचक हैं)
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5 वर्ष पहले
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