आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वो शाम कुछ ख़ामोश थी…

                
                                                         
                            वो शाम कुछ ख़ामोश थी,
                                                                 
                            
हर बात भी ख़ामोश थी,
वो कल भी दिल के पास थी,
वो आज भी एहसास है।

झुकी हुई निगाह में,
कोई अधूरी बात थी,
दबी-दबी सी हँसी में,
कोई मीठी सी याद थी।
मैं सोचता था चाँद भी,
कहीं उसको निहारता है,
न जाने क्यों ये दिल मेरा,
उसी को पुकारता है।

मेरा ख़याल है अभी,
उस चाँदनी सी शाम में,
छुपी हुई सी चाह भी,
है आज तक जज़्बात में।
मैं जानता हूँ ये दिल भी,
उसी का नाम लेता है,
यही ख़याल है मुझे,
वो आज भी मुझे याद करती है।

वो शाम कुछ ख़ामोश थी,
हर बात भी ख़ामोश थी,
वो कल भी दिल के पास थी,
वो आज भी एहसास है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर