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शब्द को मेरे पंख दे दो

                
                                                         
                            शब्द को मेरे पंख दे दो
                                                                 
                            
न अलंकार, न कोई प्रश्न,
शब्द को मेरे पंख दे दो।
शब्द मेरे साथी हैं, मेरा सहारा हैं,
मेरे मन की गहराइयों का इशारा हैं।
ये कागज़ पर उतरते हैं, तो एहसास बन जाते हैं,
इनमें छिपे मेरे ख़्वाब, मेरी पहचान बन जाते हैं।
ये शब्द ही हैं, जो चुप्पी को आवाज़ देते हैं,
बिखरे हुए मन को फिर से साज़ देते हैं।
कभी ये खुशी बनकर मुस्कुरा उठते हैं,
कभी ये आँसू बनकर आँखों में बहते हैं।
मुझे नहीं चाहिए कोई अलंकार इनमें,
न भाषा का कोई श्रृंगार इनमें।
इनकी सादगी ही इनकी ताकत है,
इनकी सच्चाई ही इनकी इबादत है।
न मुझसे सवाल करो, न जवाब दो,
बस इन शब्दों को आसमान तक जाने दो।
ये रुकते नहीं, ये थमते नहीं,
बस बहते हैं, जैसे हवाएँ बहती हैं।
इन शब्दों में मेरा मन बसता है,
इनमें ही मेरा हर सपना हँसता है।
जो कह नहीं पाता मैं किसी से,
वही शब्द बनकर कागज़ पर उतरता है।
मेरे शब्द किसी बंधन में रहना नहीं चाहते,
ये अपने भावों को दबाना नहीं चाहते।
ये दर्द भी कहेंगे, ये प्यार भी कहेंगे,
जो दिल में है, उसे खुलकर कहेंगे।
शब्दों को मेरे पंख दे दो,
ये उड़ना चाहते हैं, बहुत दूर तक जाना चाहते हैं।
मेरे दिल की बातें दुनिया तक पहुँचाना चाहते हैं,
हर दिल को छूकर मुस्कुराना चाहते हैं।
न इन्हें रोकना, न इन्हें बाँधना,
बस इनकी उड़ान को खुला आसमान देना।
शब्दों को मेरे पंख दे दो,
मेरे एहसासों को एक नई पहचान दे दो।
 
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एक घंटा पहले

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