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पंद्रह अगस्त — आज़ादी की कहानी

                
                                                         
                             पंद्रह अगस्त — आज़ादी की कहानी
                                                                 
                            
वो रात भयावह थी,
जिससे हर दिल सहम जाता था,
चारों ओर चीख-पुकार थी,
हर तरफ़ पीड़ा का साया था।
जब अँधियारे का साम्राज्य था,
ब्रिटिशों का राज था,
भारतीयों के दिलों में अँधेरा था,
उजाला ब्रिटिशों के हाथ में था।
भारत की धरती हमारी थी,
मगर शासन पराया था,
मिट्टी हमारी थी,
मगर सत्ता उनकी थी।
भारतीयों के पास
अपनी आवाज़ सीमित थी,
अधिकार सीमित थे,
और अपने शासन में
हमारी भागीदारी भी सीमित थी।
हम इसी मिट्टी के वासी थे,
फिर भी पराधीनता में जी रहे थे।
साँसें अपनी थीं,
मगर उन पर भी जैसे पहरा था।
अपनी बात कहना भी
कठिन हो गया था।
भूख से किसान व्याकुल था,
गरीबी से घर टूट रहे थे।
मेहनत हमारी थी,
मगर उसका पूरा फल
हमारे हिस्से में नहीं आता था।
अपनी धरती पर पराया शासन था,
लेकिन हृदय में स्वतंत्रता का अरमान था।
हर आँख में एक स्वप्न था,
हर धड़कन में हिंदुस्तान था।
जब अपनी ही धरती पर
अपनी पहचान का प्रश्न उठता था,
तो मन के भीतर एक सवाल गूँजता था—
क्या हम सच में स्वतंत्र हैं?
लेकिन उसी अँधेरे के बीच
एक महापुरुष शांति का संदेश लेकर आया,
जिसने संघर्ष के माध्यम से
भारत को जगाया।
सत्य उसका संबल था,
अहिंसा उसका अस्त्र था,
और दृढ़ संकल्प
उसकी सबसे बड़ी शक्ति था।
नमक उसका बहाना था,
मगर निशाना गुलामी की जंजीरें थीं।
दांडी की ओर बढ़ते कदमों में
पूरे भारत की धड़कनें थीं।
चलना उसका संकल्प था,
देश जगाना उसका उद्देश्य था,
संघर्ष करना उसका कर्तव्य था,
और स्वतंत्रता उसका स्वप्न था।
उसकी तस्वीर बाद में
भारत के नोटों पर आई,
लेकिन उसकी असली पहचान
भारत के स्वतंत्रता संग्राम से बनी।
उसने हथियार नहीं उठाए,
फिर भी साम्राज्य की नींव हिला दी।
उसने हिंसा का मार्ग नहीं चुना,
फिर भी करोड़ों भारतीयों में
स्वतंत्रता की ज्योति जला दी।
दिन-ब-दिन संघर्ष प्रबल होता गया,
गुलामी के विरुद्ध स्वर मुखर होता गया।
किसी ने सत्याग्रह का मार्ग चुना,
किसी ने क्रांति की राह अपनाई।
किसी ने कारावास सहा,
किसी ने लाठियाँ खाईं,
किसी ने अपने प्राण न्योछावर किए,
और किसी ने अपना संपूर्ण जीवन
मातृभूमि के नाम कर दिया।
हर बलिदान के साथ
स्वतंत्रता की सुबह
और निकट आती गई।
और फिर आया वह ऐतिहासिक दिवस—
15 अगस्त 1947।
पराधीनता की रात्रि समाप्त हुई,
भारत ने स्वतंत्रता की पहली साँस ली।
जिस धरती पर कभी
पराए शासन का अधिकार था,
उसी धरती ने उस दिन
स्वतंत्र भारत का तिरंगा लहराया।
तिरंगा हमारा लहरा रहा था,
हर भारतीय का सीना गर्व से भर रहा था।
वह दिन केवल एक दिन नहीं था,
वह सदियों के संघर्ष का परिणाम था।
गुलामी की रात बीत चुकी थी,
स्वतंत्रता का सूर्य उदित हो चुका था।
जिस देश ने वर्षों तक अँधेरा सहा,
उसके आकाश में
अब तिरंगा शान से लहरा रहा था।
तिरंगा केवल तीन रंगों का ध्वज नहीं था,
वह हमारे संघर्ष और बलिदान की पहचान था।
केसरिया—वीरता और त्याग की शान था,
सफेद—शांति और सत्य का सम्मान था,
हरा—समृद्धि और आशा का अरमान था,
और बीच में अशोक चक्र
निरंतर आगे बढ़ते रहने का संदेश था।
वो तिरंगा देखकर
हर भारतीय के हृदय में
एक ही स्वर गूँज रहा था—
यह देश हमारा है,
यह मिट्टी हमारी है,
और यह स्वतंत्रता हमारी है। 🇮🇳
आज हम खुली हवा में साँस लेते हैं,
अपनी बात कह सकते हैं,
अपने सपनों को आकार दे सकते हैं।
क्योंकि किसी ने संघर्ष किया था,
किसी ने कारावास सहा था,
किसी ने अपना रक्त बहाया था,
और किसी ने अपना पूरा जीवन
राष्ट्र के नाम कर दिया था।
इसलिए 15 अगस्त केवल एक तारीख नहीं,
यह उन अनगिनत वीरों के त्याग,
संघर्ष और बलिदान की अमर गाथा है।
बंद मुट्ठी में इतनी शक्ति थी,
कि रगों में रक्त दौड़ पड़ा।
भारत की एकजुट मुट्ठी ने
स्वतंत्रता की इच्छा जगा दी,
और आज़ादी की चाह ने
हर भारतीय का हृदय मिला दिया।
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 मिनट पहले

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