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काश मैं पत्थर सा होता

                
                                                         
                            काश!मैं पत्थर सा होता,
                                                                 
                            
मारने पर दो टुकड़ों में बॅंट जाता,
काटने पर दो रूपों में छॅंठ जाता,
कुरेदने पर आकर ले लेता,और
पूजने पर भगवान बन जाता,
काश! मैं पत्थर सा होता।

मैं पड़ा सीढ़ियों में होता या,
पूर्वजों की पीढ़ियों से होता,
मेरा मूल्य भी उतना होता,
जितना माॅं का एक बच्चा होता,
काश!किसी का लगाव सच्चा होता,
काश! मैं पत्थर सा होता।

जिम्मेदारियों से ना लदा होता,
किसी की बातों से ना दबा होता,
भावनाओं से ना बंधा होता,
उम्मीदों से ना कॅंसा होता,
किसी के हृदय में ना बॅंसा होता,
काश! मैं पत्थर सा होता।

ना किसी से दिल लगाता,
ना किसी का दिल दुखाता,
ना मेरे कोई समीप आता,
ना मैं किसी से दूर जाता,
काश! मैं सुनसान सा होता,
काश! मैं पत्थर सा होता।

अपमान का ना शो़क होता,
सम्मान का ना लोभ होता,
धन का ना ज्ञान होता,
ज्ञान का ना घमंड होता है,
हाय! काश मैं निर्जीव सा होता,
काश! में पत्थर सा होता।
- अनामिका ज्ञानशंकर सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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