आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गरमा गरम ओले

                
                                                         
                            आ गया फिर से वही आग उगलता मौसम,
                                                                 
                            
फिर तपाने लगा रात दिन झुलसता मौसम।

चांदनी रात की ठंडक
को निगल जाता है,
सारे दिन गरमा गरम
ओले ये बरसाता है।
चमकता धूप में सोने सा पिघलता मौसम।

इसकी गर्मी को सिर्फ
वृक्ष ही सह पाते हैं,
सारे मासूम पेड़
जड़ से सूख जाते हैं।
उफन रहा है दुपहरी में उबलता मौसम।

सबसे ये जलता है
इससे भी सभी जलते हैं,
इसकी लू की बुरी नजर
से बच के चलते हैं।
अपने भी दिल को जलाता है ये जलता मौसम।
-अनिल भारद्वाज 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर