कोई नहीं जानता है जग में
कब किसको क्या हो जाए।
कब जीवन बसंत हो जाए,
कब पतझड़ सा झड़ जाए।
कब खुशियों की बारिश हो,
कब गम की धूप निकल आए।
कब तक पंछी उड़े गगन में
कब माटी में मिल जाए।
आज मिला था जो हंस हंसकर,
कल सदैव को खो जाए।
जो सबको बुलवाते हैं कब
उन्हें बुलावा आ जाए।
कब तक देह रहे चंदन सी,
कब चंदन संग जल जाए।
कर्म करो ऐसे कि हर सदी
सदां तुम्हारे गुण गाए।
- अनिल भारद्वाज
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