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सोनजुही सा खिलता

                
                                                         
                            दिल तो ना भरता लेकिन कुछ सुकून तो मिलता,
                                                                 
                            
कुछ दिन और साथ रह जाते तो अच्छा लगता।

जो दिन संग बिताए हमने
तुम्हें याद करते हैं,
उनकी पलकों से प्रतीक्षा
के आंसू झरते हैं।

बीच राह में साथ छोड़ कर चले गए दिल का,
जीवन भर यदि साथ निभाते तो अच्छा लगता।

तुम जिस दिन मिलने आते
वो दिन सोने सा लगता,
तुम्हें देख कर ये मुरझा मन
सोनजुही सा खिलता।

सूरज चंदा तारों से भी पता अगर मिलता,
तुम्हें ढूंढ हम वापस लाते तो अच्छा लगता।

सपनों में ये यादें हमसे
तुम्हें मिला जातीं हैं,
मिलने की चाहत को आकर
अमृत पिला जाती हैं।

तुम हो जहां वहां से कोई लौट नहीं सकता,
एक बार मिलने आ जाते तो अच्छा लगता।

लगता है तुमसे बिछड़े
जाने कितने युग बीते,
बिना तुम्हारे उम्र थक गई
है अब जीते जीते।

तुम बिन यहां अकेले रहना अब बोझिल लगता,
हमें संग अपने ले जाते तो अच्छा लगता।
- अनिल भारद्वाज एडवोकेट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 महीने पहले

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