कदंब तले झूला
सावन की रुत आई सखी रे,
छाई बदरिया कारी,
कदंब की डार झूला डोले,
झूले श्यामा प्यारी।
झूम-झूम गाए कोयलिया,
वन में गूँजे तान,
मधुर-मधुर बंशी की धुन पर,
नाचे सारा जहान।
रेशम डोरी, फूलन माला,
सज गया मधुवन आज,
राधा संग कुंजबिहारी,
रचते प्रेम-उल्लास।
हरियाली की ओढ़ चुनरिया,
धरती सजी सँवारी,
देखत रूप त्रिभंगी का,
मन होत बलिहारी।
घन बरसे, पुरवैया डोले,
भीगे वन-उपवन,
राधा के अधरों पर मुस्कान,
श्याम निहारें मन।
झूला ऊँचा, प्रेम अनंत,
मिट जाए जग की दूरी,
सावन के इस पावन क्षण में,
मन हो जाए पूरी।
कदंब तले वह प्रेम-सुधा जब
झरती बनकर फुहार,
राधा-श्याम के नाम से महके
सारा ब्रज संसार।
- अनिता चतुर्वेदी
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