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जब भी बहार आई

                
                                                         
                            जब भी बहार आई पतझड़
                                                                 
                            
को लेकर आयी।
इस बेक़रार दिल को कभी
क़रार ना हुआ।।

जिसके भरोसे उतरे सागर में
ले कर नैया।
तूफ़ान में फंसे तब वो सहारा
ना हुआ।

अपने दर-ओ-दिवार में महफूज
थे कभी।
दुनिया में क्या निकले कोई हमारा
ना हुआ।।

ज़ख़्मों के सिवा दिल को कुछ दे
सके ना हम।
उठी टीस उसमें ऐसी की गुज़ारा
ना हुआ।।

जिंदगी में उलझने और परेशानियां
रही।
किसी से टूट कर जुड़ना हमें गवारा
ना हुआ।।
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एक घंटा पहले

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