वर्षा-
मानो बादलों के हृदय में उमड़ा कोई अव्यक्त विषाद,
जो बूंदों का वेश धरकर धरती पर उतर आया हो।
यह आकाश की भीगी हुई उदासी है,
जो चुपके से खेतों, पत्तों और गलियों में बिखर जाती है।
कितना विचित्र है,
जिसे जगत हर्ष का उत्सव समझता है,
वह दरअसल मेघों के मन का
मूक, विरहभरा विलाप है।
और हम,
उस शोकगीत में भीगकर,
उसे सावन की मुस्कान कह देते हैं।
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