अस्पताल की एक रात...
सिर्फ़ एक रात नहीं होती,
वो बरसों से सजे रिश्तों का इम्तिहान होती है।
उसी रात पता चलता है,
कौन तुम्हारी सलामती के लिए
रब से दुआ माँग रहा है,
और कौन सिर्फ़ औपचारिकता निभाकर
अपने फ़र्ज़ से छुटकारा पा रहा है।
वहीं मालूम पड़ता है,
कि रिश्ते ख़ून से नहीं,
वक़्त देने से ज़िंदा रहते हैं।
जो अक्सर कहते थे—
"कभी भी याद करना..."
वो सबसे पहले ग़ायब हो जाते हैं।
और जिनसे कोई उम्मीद भी नहीं होती,
वही रातभर जागकर
तुम्हारी साँसों की रखवाली करते हैं।
अस्पताल की एक रात,
चेहरों से नक़ाब उतार देती है।
कोई दवा लाने के बहाने
अपना फ़र्ज़ निभा देता है,
तो कोई एक गिलास पानी पकड़ाकर
अपना पूरा इंसान होना साबित कर देता है।
वहीं समझ आता है,
कि भीड़ में खड़े सौ अपने,
उस एक शख़्स के बराबर नहीं होते,
जो तुम्हारे दर्द को
अपना दर्द समझकर जीता है।
अस्पताल की एक रात
ये भी सिखा देती है कि...
मुसीबत में साथ खड़े लोग,
रिश्तेदार नहीं,
रब की भेजी हुई रहमत होते हैं।
और जो उस वक़्त भी
तुम्हें अकेला छोड़ जाएँ,
उन्हें उम्रभर कोई शिकायत नहीं,
बस एक ख़ामोश दुआ देनी चाहिए—
कि कभी किसी को
ऐसी तन्हा रात न मिले।
याद रखना...
ज़िंदगी में दौलत, शोहरत और पहचान
सब फिर से कमाई जा सकती है,
मगर अस्पताल की एक रात में
जो इंसान खो जाते हैं,
वो अक्सर ज़िंदगी भर
रिश्तों में लौटकर नहीं आते।
क्योंकि...
अस्पताल की एक रात,
बीमारी का नहीं,
इंसानों का असली इलाज और असली हिसाब बता जाती है।
"अगर रिश्तों की असली गिनती करनी हो,
तो किसी शादी में मत जाना...
एक रात अस्पताल में गुज़ार लेना,
अपने और पराए,
दोनों ख़ुद-ब-ख़ुद गिने हुए मिल जाएँगे।"
-दीपक शर्मा "दीप"
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