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हक़ीक़त को बस छुपाना है

                
                                                         
                            अफ़साना लिखना तो बहाना है,
                                                                 
                            
हक़ीक़त को बस छुपाना है।

ख़ाली बैठेगा तो रोएगा ये,
दिल को बस काम पर लगाना है।

महफ़िलों में वो जो हँसते हैं,
ख़ुद को रोने से बस बचाना है।

नाम उनका न आ सके लब पर,
दास्ताँ को ऐसे बढ़ाना है।

ख़त्म होगी न ये कहानी कभी,
उम्र भर का ये आना-जाना है।
-देवेन्द्र पंत
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46 मिनट पहले

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