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दीपेश शर्मा सौभरि: वही कमरे हमें अच्छे लगे हैं, जहाँ पर आज भी पर्दे लगे हैं

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वही कमरे हमें अच्छे लगे हैं
जहाँ पर आज भी पर्दे लगे हैं

तुम्हारे बिन बहुत बे-रंग है घर
दर-ओ-दीवार पर जाले लगे हैं

कोई तो बात दिल को लग गई है
यूँ ही थोड़ी वो चुप रहने लगे हैं

इसी कमरे में ही होगा ख़ज़ाना
मियाँ इस में बहुत ताले लगे हैं

क़यामत आ गई नज़दीक शायद
मोहब्बत हम से सब करने लगे हैं

शजर को काटना वाजिब नहीं है
शजर पर अब भी कुछ पत्ते लगे हैं

एक दिन पहले

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