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जंग लगी मशीन

                
                                                         
                            जिंदगी जंग लगी मशीन सी
                                                                 
                            
चल रही है
बिल्कुल उस खटारा दोस्त के स्कूटर सी

बहुत बार चलती है
कई बार बस खड़ी रहती है
बेजान सूखी लकड़ी जैसी

कभी यकलख्त दौड़ पड़ती है
बहुत बार उदासी के अंतिम
पड़ाव तक मन चले जाता

ना चिड़ियाओ की चहचहाहट
मन को भाती है
ना हरियाली

तकलीफ़ सांझा भी किससे करें
मुझसे मुलाकात करने
मेरे अलावा कोई आता भी तो नहीं

ज़िंदगी जंग लगी मशीन सी
चल रही है
बिल्कुल उस खटारा दोस्त की स्कूटर सी
- बिजय जोशी 
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