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उजास...

                
                                                         
                            जब तुमने श्रृंगार में
                                                                 
                            
अपनी आँखों में काजल उतारा,
मानो समूचे संसार की
अद्वितीय आभा
तुम्हारे चेहरे पर उतर आई।

और जब पीहर की यादों में डूबकर
घर के किसी शांत कोने में
अश्रु की कुछ बूंदें
धीरे-से पलकों से फिसलीं,
तो तुम्हारे नयन का वही काजल
चुपचाप सोख लेता
उन अनकही स्मृतियों का बोझ।

मानो वह कह रहा हो—
मैं हूँ ना,
तुम्हारी हर उदासी
अपने भीतर समेट लेने को,
ताकि तुम्हारे चेहरे पर
फिर वही उजास खिल सके।
-बिजय जोशी
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