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                            कैसी निःशब्दता
                                                                 
                            
कैसी ये पीर है
व्याकुल हैं नैन भी
मन भी अधीर है
घायल जो कर गया
हमें वो तेरे
लफ़्ज़ों का तीर है
बरसे तेरे वियोग में
नैनो से नीर है
जग से विरक्ता
जीवन विवशता
हृदय तो आज भी
जैसे कबीर है।
- फ़ौज़िया नसीम शाद
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2 घंटे पहले

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