लंका पर जब करी चढ़ाई| सब निश्चर सेना घबराई||
मेघनाद ने शक्ति चलाई| मूर्छित लखन-दुखी रघुराई||
हनुमत बूटी लेकर आया| लक्ष्मण ने वापस बल पाया||
भेद विभीषण ने बतलाया| नाभी में है अम्रत माया||
रघुवर ने ब्रह्मास्त्र चलाया| खत्म हुई तब निश्चर माया||
रावण सैन्य सहित सब निश्चर| दिऐ मार सारे इक-इक कर||
भक्त विभीषण नृप कहलाऐ| सीता को लंका से लाऐ||
चौदह वर्ष पूर्ण कर रघुवर| चले लौटकर आज अवधपुर||
रावण मार अवधपुर आऐ| घर-घर मानो मंगल छाऐ||
राज-तिलक की थी तैयारी| हुऐ राम अब अवध-बिहारी||
धोबी ने धोबिन धमकाई| सुनकर व्यथित हुऐ रघुराई||
आज प्रजा ने ऐसी ठानी| बदल गई सब राम कहानी||
रघुवर ने सीता को त्यागा| टूटा पुण्य-प्रेम का धागा||
अवधपुरी सीता ने त्यागी| वन में चली बनी बैरागी||
राजधर्म रघुकुल पर भारी| जनता जीती-सीता हारी||
वाल्मीकि आश्रम सिय आईं| कुटिया में तब आश्रय पाईं||
वन में सीता ने दुख पाया| लव-कुश दो बेटों को जाया||
अश्वमेघ रघुकुल का घोड़ा| वन में आया दौड़ा-दौड़ा||
लवकुश अवधपुरी पर भारी| चली अवध की सेना सारी||
वन में जब रघुनन्दन आऐ| सम्मुख सुन्दर बालक पाऐ||
क्रोधित हुऐ सिया के पाले| सब सैनिक मूर्छित कर डाले||
रघुवर बार-बार समझावें| सीता-सुत को समझ न आवें||
रघुवर ने जब धनुष उठाया| सम्मुख वाल्मीकि को पाया||
वाल्मीकि ने जब समझाया| लवकुश ने घोड़ा लौटाया||
जो भी वन में हुआ मामला| जाकर सीता से कह डाला||
हुईं सिया सुन चिंतित भारी| सुत को बात बता दी सारी||
रघुनन्दन ही पिता तुम्हारे| सुनकर लवकुश हुऐ दुखारे||
वाल्मीकि से आज्ञा पाई| चले अवधपुर दोनों भाई||
लवकुश ने जब कथा सुनाई| सारी अवधपुरी हर्षायी||
रघुवर ने दरबार बुलाया| लवकुश ने सब सार सुनाया||
कह डाले सब वचन व्यथा के| हम ही दो सुत हैं सीता के||
हुऐ प्रफुल्लित सब दरबारी| हर्षित आज अवधपति भारी||
हम आऐ हैं न्याय दिलाने| बोला रघुवर से लवकुश ने||
रघुवर ने आदेश सुनाया| सीता को दरबार बुलाया||
वाल्मीकि सीता को लेकर| आ पहुँचे तब नगर अवधपुर||
वाल्मीकि ने जब समझाया| जनता को समझ कुछ न आया||
सीता दुखी हुईं मन भारी| व्याकुल धरती मातु पुकारी||
सीता समा गईं धरती में| चिन्ता जागी अवधपती में||
लवकुश दो बेटों को पाया| सहस एकदश राज चलाया||
रामराज सबने सुख पाया| काल आज रघुकुल में आया||
दुर्वासा ले शोक पधारे| लक्ष्मण म्रत्यु-दण्ड से हारे||
सरयू में जब किया आचमन| पावन-धाम गऐ तब लक्ष्मण||
गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लेकर| राज-काज लवकुश को देकर||
अवधपुरी से करी विदाई| पावन-धाम चले रघुराई||
अवधपुरी के सरयू तट पर| पावन-धाम चले जब रघुवर||
देवों ने रघुवर जयकारे| परम-धाम रघुवीर सिधारे||
विदा हुआ त्रेता-युग सारा| देवलोक में दिव्य नजारा||
शान्त हुआ सरयू का पानी| पूर्ण हुई ये राम कहानी||
-जितेंद्र त्रिपाठी 'हेमू'
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