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मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म- गुनगुनाती हुई हर रात यहीं से निकली

उर्दू अदब
                
                                                         
                            प्यार से आँख भर आती है कँवल खिलते हैं
                                                                 
                            
जब कभी लब पे तिरा नाम-ए-वफ़ा आता है

दश्त की रात में बारात यहीं से निकली
राग की रंग की बरसात यहीं से निकली
इन्क़िलाबात की हर बात यहीं से निकली
गुनगुनाती हुई हर रात यहीं से निकली

धन की घनघोर घटाएँ हैं न हुन के बादल
सोने चाँदी के गली-कूचे न हीरों के महल
आज भी जिस्म के अम्बार हैं बाज़ारों में
ख़्वाजा-ए-शहर है यूसुफ़ के ख़रीदारों में

शहर बाक़ी है मोहब्बत का निशाँ बाक़ी है
दिलबरी बाक़ी है दिल-दारी-ए-जाँ बाक़ी है
सर-ए-फ़हरिस्त निगाराँ-ए-जहाँ बाक़ी है
तू नहीं है तिरी चश्म-ए-निगराँ बाक़ी है

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8 घंटे पहले

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