माँ के बाद
मैं रोता नहीं हूँ,
बस भीतर ही भीतर
कुछ टूटता रहता है।
भीड़ में खड़ा होता हूँ
तो लगता है
किसी ने मेरा हाथ
अचानक छोड़ दिया हो।
बचपन
अब याद नहीं आता—
वह चुपचाप
सीने में चुभता है,
जैसे काँटा
जो निकाला नहीं जा सका।
माँ,
तुम्हारा आँचल
कोई कपड़ा नहीं था,
वह एक पता था
जहाँ हर डर
खुद रास्ता भूल जाता था।
आज रास्ते बहुत हैं,
पर मंज़िल नहीं।
रात को नींद आती है
तो अपराध-बोध के साथ—
क्योंकि याद आता है
तुम जागती थीं
जब मैं सो जाता था।
“खालो, भूख लगी होगी”
यह वाक्य
अब किसी किताब में नहीं,
मेरे खून में लिखा है।
मैं कह देता था—
“अभी खाया है”
और तुम मान लेती थीं,
कितनी आसानी से
तुम हार जाती थीं मुझसे।
मैं तुम्हारा
जिगर का टुकड़ा था,
और तुम—
मेरी पूरी दुनिया।
माँ,
तुम दूर नहीं गईं,
तुम भीतर चली गईं—
इतना भीतर
कि अब हर खुशी
अधूरी लगती है।
मंदिर, मस्जिद,
सब अपनी जगह हैं,
पर अगर सच कहूँ—
ईश्वर की सबसे
जीवित शक्ल
मैंने तुम्हीं में देखी थी।
स्वर्ग की कल्पना
अब फालतू लगती है,
क्योंकि
जिसने जीवन दिया
वही सबसे बड़ा चमत्कार थी।
माँ
कोई रिश्ता नहीं,
एक पूरी सभ्यता है—
ममता की भाषा,
प्रेम का व्याकरण
और करुणा का इतिहास।
आज घर है,
आँगन है,
सब कुछ है—
बस वह आवाज़ नहीं
जो कहती थी,
“डर मत, मैं हूँ।”
नीरज कुमार
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