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डॉ. दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' की 2 चुनिंदा ग़ज़लें

उर्दू अदब
                
                                                         
                            सारे रूपक सारे बिंब विधान अधूरे हैं 
                                                                 
                            
तेरे सम्मुख सबके सब उपमान अधूरे हैं ।

भक्त अधूरे होते  हैं जैसे भगवान बिना ,
भक्तों के बिन वैसे ही भगवान अधूरे हैं ।

खुद से ही प्रारंभ न होता हो बदलाव अगर ,
युग परिवर्तन के सारे अभियान अधूरे हैं ।

अभी-अभी तो आए ही हो लो चल पड़े अभी 
अभी न जाओ अभी मेरे अरमान अधूरे हैं ।

घर में घर के जैसा कुछ भी लगता नहीं मुझे , 
बिना तुम्हारे घर के सब सामान अधूरे हैं ।

तेरे बदन की खुशबू मुझमें ऐसी है पैबस्त 
इत्र, अगर ,परफ्यूम, धूप ,लोबान अधूरे हैं ।

जिनमें प्यार मुहब्बत वाले फूल न शामिल हों , 
रिश्तों के वे सारे ही गुलदान अधूरे हैं । आगे पढ़ें

व्यर्थ मेरे लिए हर नदी हो गई

9 घंटे पहले

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