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जिन्दगी के कदम

                
                                                         
                            जिन्दगी के मैंने बहुत रंग देखे
                                                                 
                            
कभी रंग रंगीन बदरंग देखे
कभी रात तो दिन रात के संग देखे
मैं जागा नहीं था जगाया गया हूँ

अनजान राहों में रब के भरोसे
मैं चलता रहा प्रेम धागे पिरो के
निशाने से पहले नियंत्रण को खो के
गिरा मैं नहीं था गिराया गया हूँ

ये लालच ये स्वारथ ये मौका ये धोखा
ये मौसम मुसीबत ये तूफ़ाँ के झोका
मुझे मेरी मंजिल से अपनों ने रोका
मैं हारा नहीं था हराया गया हूँ

ये कुर्सी का लालच ये पद की प्रतिष्ठा
ये धन के झमेले ये मतलब की निष्ठा
नहीं ऐसी मन में रही मेरी इच्छा
मैं लोलुप नहीं था लुभाया गया हूँ

जमाने ने मुझको बहुत कुछ सिखाया
नमन उसको जिसने पढ़ाया-लिखाया
किया मैंने वो सब जो मुझको न भाया
मैं पागल नहीं था बनाया गया हूँ

चैन बैचेन में मेरा तब्दील था
मैं फिर भी जमाने में गतिशील था
मैं कर्मठ क्रियाशील श्रमशील था
मैं भूला नहीं था भटकाया गया हूँ

न ऋतुराज आऐ हुई जब से पतझर
जलाऐ हैं लोगों ने लोगों के घर-घर
आँखों में आँसू लिऐ रात-दिन भर
संसार का मैं सताया हुआ हूँ

बहुत हो चुकी मौज-मस्ती तुम्हारी
ना बचेगी जमानो हस्ती तुम्हारी
देख ली सारी हरकत सस्ती तुम्हारी
मैं भी बेदाग नहीं दर्शाया गया हूँ
-जितेंद्र त्रिपाठी 'हेमू'
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एक घंटा पहले

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