कुछ तुम कहो न सखी, इस संध्या की बेला में,
मन बावरा है, उलझा है यादों के रेला में।
दूसरी सखी आज बहुत तकलीफ में है,
कि माँ का आँचल छूट गया, वो एक अजीब सी टीस में है।
माँ का प्यार अब कहाँ से वो लाएगी?
जब भी चौखट लाँघकर अपने घर जाएगी,
वहाँ माँ का चेहरा न देख पाएगी।
क्या कहूँ, कैसे कहूँ इस बोझिल संध्या बेला में,
कि माँ तो ममता की मूरत थी, हर दुख-सुख के रेला में।
बिना कहे जो सब समझ जाती थी,
"क्या हुआ? कोई बात है क्या?" कहकर सीने से लगाती थी।
वो कहती थी, "तेरी आवाज़ ही सब कह देती है,"
माँ की वो परख अब आँखों को नम कर देती है।
कहने को तो बहुत सारी सखियाँ हैं यहाँ,
पर माँ! तेरे जैसा सुकून अब ढूँढूँ कहाँ?
मेरा मायका तुझसे ही ज़िंदा था,
तू मेरी पहली सखी, तू ही गुरु, तू ही आसमाँ।
मेरे हौसलों को उड़ान भी तूने ही दी थी,
मेरे जीवन की हर मुश्किल तूने ही पी थी।
क्या कहूँ सखी इस ढलती संध्या बेला में,
कि एक सखी आज अकेली है, अपनी माँ की यादों के मेले में।
-ज्योती वर्णवाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X