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आत्म-छल

                
                                                         
                            जब मैं उससे बोलता हूँ—
                                                                 
                            
"चल, बाहर कहीं?"
तो जवाब आता है—
"यहाँ ठीक तो है।"

मैं बोलता हूँ—
"तुम डरते हो?"
जवाब— "मैं? कहाँ!"

मैं बोलता हूँ—
"तुम्हारी संभावनाएँ उच्चतम हैं!"
जवाब— "मैं संतुष्ट हूँ।"

मैं पूछता हूँ— "सच में?"
जवाब— "और नहीं तो क्या!"

मैं बोलता हूँ—
"फिर तुम बार-बार ठोकरें क्यों खाते हो?"
जवाब— "यही तो ज़िंदगी है।"

मैं पूछता हूँ— "सच में?"
जवाब— "और नहीं तो क्या!"

मैं उससे टूटन भरे सवाल पूछता नहीं,
वह मुझे टूटन भरे उत्तर देता नहीं।
मैं जीवन भर ठोकरें खाता रहता हूँ ,
और वह इसे 'ज़िंदगी' का नाम दे देता है!

इसी झूठ पर हमारा रिश्ता आज भी कायम है...
शायद यह झूठ ही है!

यह सहारा... आखिर कब तक?

~ कपिल तिवारी"यथार्थ"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
49 मिनट पहले

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