मेरे रोम रोम में राम है कण कण में घनश्याम हैं
जीवन में हैं प्राण में हैं, हर क्षण में हैं हर एहसास में हैं
मेरी हर एक आश में हैं, जीवन के हर पल खास में हैं
कैसे कहूं कि
मेरे रोम रोम में राम हैं कण कण में घनश्याम हैं
मेरे हर एक उल्लास में है मेरी हर एक साहस में हैं
मेरे हर एक प्रयास में हैं, मेरे हर एक नाज में हैं
मेरे हर नासाज में हैं, मेरी हर एक सांस में हैं
मेरी हर प्यास में है मैं कैसे कहूं कि
मेरे रोम रोम में राम हैं,कण कण में घनश्याम हैं
मेरी हर मिन्नत में हैं, मेरी हर खिन्नत में हैं
मेरे हर एक राज में हैं मेरे हर एक साज में है
मेरे हर एक दिन में हैं, मेरी हर एक रात में हैं
मैं कैसे कहूं कि
मेरे रोम रोम में राम हैं कण कण में घनश्याम हैं
मेरे हर एक सही में हैं, मेरी हर एक गलत में हैं
मेरी हर एक मौके में हैं मेरी हर एक धोके में हैं
मेरे हर एक जुनून में हैं, मेरे हर एक सुकून में हैं
मैं कैसे कहूं कि
मेरे हर एक ध्यान में हैं, मेरे हर एक मान में हैं
मेरी हर एक शान में हैं, मेरी हर एक आन में हैं
मेरी हर एक सुबह में हैं मेरी हर एक शाम में हैं
मैं कैसे कहूं कि
मेरे रोम रोम में राम हैं कण कण में घनश्याम हैं
मेरे हर एक सम्मान में हैं मेरे हर एक एहसान में हैं
मैं कैसे कहूं कि
मेरे रोम रोम में राम हैं कण कण में घनश्याम हैं
कहें राम ऐ बंदे तू ढूंढ मन से मुझे
फिर तू जहां पुकारेगा वहीं खड़ा मुझे पाएगा
क्योंकि अंदर झांक जरा तेरे बैठा मिलूंगा मैं भीतर तेरे
तू व्यर्थ चिंता करता है व्यर्थ मर- मर के जीता है
जब मैं हूं साथ तेरे फिर काहे को डरता है
ले थाम हाथ मेरा फिर चल जहां तुझे चलना है
फिर तू जो चाहेगी वही पाएगा बस रहना हमेशा पास मेरे
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