ख़ुशियाँ हों या ग़म आ जाता है पानी
आँखों का यूँ साथ निभाता है पानी
उसकी गली में ऐसे भटक रहा हूँ मैं
भंवर मे जैसे चक्कर खाता है पानी
सहरा और समंदर दोनों मत होना
दोनों में प्यासा रह जाता है पानी
धरती पर पानी ही पानी है फिर भी
धरती को आकाश पिलाता है पानी
सबको दरिया पार कराती है कश्ती
और कश्ती को पार लगाता है पानी
मेरे घर की छत में बहुत दरारें हैं
मेरे घर को बहुत रुलाता है पानी
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